मसूरी में जनजातीय भाषाओं और संग्रहालयों पर राष्ट्रीय मंथन शुरू
कर्नाटक के मैसूरु में 24 अगस्त 2026 से तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन की शुरुआत हुई, जिसमें जनजातीय भाषाओं के संरक्षण, डिजिटल दस्तावेजीकरण और संग्रहालयों की भूमिका पर चर्चा केंद्रित रही। होटल सदर्न स्टार में शुरू हुए इस सम्मेलन का उद्घाटन केंद्रीय जनजातीय कार्य राज्य मंत्री दुर्गादास उइके ने किया।
भाषा संरक्षण और जनजातीय पहचान पर फोकस
यह सम्मेलन केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय, केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (CIIL), मैसूरु, कर्नाटक के अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग और कर्नाटक राज्य जनजातीय अनुसंधान संस्थान (KSTRI) के संयुक्त सहयोग से आयोजित किया गया है। इसका उद्देश्य उन जनजातीय भाषाओं और बोलियों को संरक्षित करना है, जो अक्सर मानक लिपि में दर्ज नहीं हैं और मौखिक परंपरा के जरिए पीढ़ियों तक आगे बढ़ती रही हैं।
भारत में संविधान के तहत 705 अनुसूचित जनजातियाँ मान्य हैं और इनमें कई समुदाय अलग-अलग भाषा परिवारों से जुड़ी भाषाएँ बोलते हैं। इनमें ऑस्ट्रोएशियाटिक, द्रविड़, तिब्बती-बर्मी और इंडो-आर्यन भाषा परिवार शामिल हैं। ऐसे में भाषा संरक्षण केवल भाषाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा विषय भी बन जाता है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म से नई उम्मीद
सम्मेलन में आदिवाणी डिजिटल प्लेटफॉर्म के उन्नत संस्करण पर भी जोर दिया गया, जिसमें पाँच नई जनजातीय भाषाएँ जोड़ी गई हैं। इसके साथ iOS ऐप और ट्राइबॉट प्लेटफॉर्म की शुरुआत भी की गई। आदिवाणी जैसे डिजिटल माध्यम जनजातीय भाषाओं के लिए पाठ्य सामग्री, ऑडियो संसाधन, अनुवाद सहायता और सीखने के उपकरण उपलब्ध कराते हैं।
ऐसे प्लेटफॉर्म खास तौर पर उन भाषाओं के लिए उपयोगी माने जाते हैं जिनका लिखित साहित्य सीमित है। स्कूलों में बहुभाषी शिक्षा, साक्षरता समर्थन और समुदाय-आधारित दस्तावेजीकरण के लिए भी इनका महत्व बढ़ रहा है।
संग्रहालयों के जरिए इतिहास और स्मृति का संरक्षण
सम्मेलन में जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों पर भी चर्चा हुई, जिन्हें TFFMs कहा जाता है। ये संग्रहालय जनजातीय इतिहास, औपनिवेशिक विरोध और समुदायों की स्मृतियों को संरक्षित करने का माध्यम हैं। देशभर में 10 राज्यों में ऐसे 11 संग्रहालय स्वीकृत किए गए हैं, जिनमें से चार का उद्घाटन हो चुका है।
कर्नाटक में बहुभाषी शिक्षा के लिए ‘कर्नाटक प्राइमर्स’ भी जारी किए गए। साथ ही, मैसूरु में एक स्थायी जनजातीय संग्रहालय स्थापित करने पर भी विचार किया जा रहा है। यह पहल जनजातीय विरासत को केवल प्रदर्शनी तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे शिक्षा और शोध से भी जोड़ती है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- CIIL, मैसूरु, भारत की भाषाओं और भाषा प्रौद्योगिकी पर काम करने वाला केंद्रीय संस्थान है।
- संविधान का अनुच्छेद 342 अनुसूचित जनजातियों की मान्यता से संबंधित है।
- जनजातीय भाषाओं के संरक्षण में प्राइमर, डिजिटल आर्काइव और अनुवाद उपकरण अहम भूमिका निभाते हैं।
- ‘विकसित भारत @2047’ भारत के 2047 तक के दीर्घकालिक राष्ट्रीय विजन से जुड़ा है।
यह सम्मेलन जनजातीय भाषाओं, शिक्षा और संग्रहालय-आधारित दस्तावेजीकरण को एक साझा मंच पर लाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे स्थानीय भाषाई विरासत को नई तकनीक और संस्थागत सहयोग के जरिए मजबूत करने की कोशिश दिखती है।