मोदी-शी वार्ता से भारत-चीन सीमा संवाद को नई गति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 12 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से इतर द्विपक्षीय बातचीत की। इस मुलाकात में दोनों नेताओं ने भारत-चीन सीमा प्रश्न, विशेषकर वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की। बातचीत का फोकस सीमा पर स्थिरता बनाए रखने, संवाद को आगे बढ़ाने और विवादित क्षेत्रों में तनाव कम करने पर रहा।
सीमा प्रश्न पर बातचीत का संदर्भ
भारत-चीन सीमा प्रश्न केवल एक भौगोलिक विवाद नहीं, बल्कि सैन्य तैनाती, गश्त व्यवस्था और राजनीतिक संवाद से जुड़ा एक जटिल मुद्दा है। एलएसी के पश्चिमी, मध्य और पूर्वी सेक्टरों को लेकर अलग-अलग संवेदनशीलताएं बनी रहती हैं। पूर्वी सेक्टर में अरुणाचल प्रदेश, मध्य सेक्टर में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ हिस्से, जबकि पश्चिमी सेक्टर में लद्दाख आता है।
भारत और चीन के बीच इस मुद्दे पर 2003 से विशेष प्रतिनिधि तंत्र के तहत बातचीत हो रही है। इसका उद्देश्य सीमा प्रबंधन के साथ-साथ किसी राजनीतिक समाधान की रूपरेखा पर चर्चा करना है। हाल के वर्षों में यह तंत्र दोनों देशों के बीच सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक माध्यमों में से एक बना हुआ है।
हालिया कूटनीतिक और सैन्य पहल
25 अगस्त 2026 को भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच विशेष प्रतिनिधियों की 25वीं दौर की वार्ता हुई। इस बैठक के बाद सीमा सीमांकन और सीमा प्रबंधन से जुड़े “आठ बिंदुओं के परिणाम और सहमति” वाला संयुक्त बयान जारी किया गया। इसके तहत पूर्वी और मध्य सेक्टर में सैन्य संचार के लिए दो नई हॉटलाइन, तथा सेना कमांडरों के लिए दो नए बैठक बिंदु तय करने की योजना बनी।
इसके बाद 1 सितंबर 2026 को मोदी और शी की मुलाकात किर्गिस्तान में शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन के दौरान भी हुई थी। इसके अलावा 6 सितंबर को अरुणाचल प्रदेश के वाचा और 7 सितंबर को चीनी पक्ष के दामाई में वरिष्ठ सैन्य कमांडर स्तर की फ्लैग मीटिंग्स भी हुईं। ये घटनाएं बताती हैं कि सीमा पर संवाद केवल शीर्ष नेतृत्व तक सीमित नहीं है, बल्कि सैन्य स्तर पर भी लगातार संपर्क बनाए रखने की कोशिश हो रही है।
एलएसी पर प्रबंधन और विवादित क्षेत्र
अक्टूबर 2024 में भारत और चीन के बीच देपसांग और डेमचोक क्षेत्रों में गश्त व्यवस्था को लेकर सहमति बनी थी। बाद में 2024 के भीतर ही इन क्षेत्रों में डिसएंगेजमेंट पूरा कर लिया गया। एलएसी अंतरराष्ट्रीय रूप से सीमांकित सीमा नहीं है, बल्कि एक वास्तविक नियंत्रण रेखा है, जिसके कारण गश्त, आमने-सामने की स्थिति और स्थानीय स्तर पर तनाव की आशंका बनी रहती है।
इसी वजह से फ्लैग मीटिंग, हॉटलाइन और कमांडर-स्तरीय वार्ता जैसे तंत्र सीमा प्रबंधन का अहम हिस्सा हैं। रक्षा मंत्रालय की 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में चीन ने उत्तरी सीमाओं के सामने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की तैनाती कम की थी। रिपोर्ट में एलएसी और पारंपरिक प्रशिक्षण क्षेत्रों में 10 संयुक्त हथियार ब्रिगेड-आकार की सेनाओं का उल्लेख भी किया गया।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- भारत-चीन सीमा वार्ता के लिए विशेष प्रतिनिधि तंत्र की शुरुआत 2003 में हुई थी।
- एलएसी को पश्चिमी, मध्य और पूर्वी सेक्टरों में समझा जाता है।
- देपसांग और डेमचोक लद्दाख के ऐसे क्षेत्र हैं, जो भारत-चीन गश्त व्यवस्था से जुड़े रहे हैं।
- शंघाई सहयोग संगठन एक यूरेशियाई अंतर-सरकारी समूह है, जिसमें भारत और चीन दोनों सदस्य हैं।
मोदी-शी वार्ता से यह संकेत मिला है कि दोनों देश सीमा पर तनाव घटाने और संवाद की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए कूटनीतिक और सैन्य दोनों स्तरों पर संपर्क बनाए रखना चाहते हैं। आने वाले समय में इन बैठकों के नतीजे एलएसी पर स्थिरता की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।