भारत में शहरी क्षेत्रों के वर्गीकरण के लिए नए ढांचे पर विचार
भारत में शहरी क्षेत्रों की पहचान और वर्गीकरण के लिए वर्तमान में जनसंख्या तथा प्रशासनिक मानकों का उपयोग किया जाता है। वर्ष 2026 में सरकार और नीति विशेषज्ञ एक नई श्रेणी “कार्यात्मक शहरी बस्तियों” को शामिल करने पर विचार कर रहे हैं। यह पहल उन क्षेत्रों की पहचान करने के उद्देश्य से की जा रही है जो व्यवहारिक रूप से शहरी स्वरूप धारण कर चुके हैं, लेकिन अभी तक पारंपरिक प्रशासनिक वर्गीकरण में शामिल नहीं हैं।
भारत में वर्तमान शहरी वर्गीकरण व्यवस्था
भारत में शहरी क्षेत्रों का वर्गीकरण मुख्य रूप से जनगणना और स्थानीय प्रशासनिक संरचना पर आधारित है। वर्तमान व्यवस्था में दो प्रमुख श्रेणियां शामिल हैं—जनगणना नगर और वैधानिक नगर। जनगणना नगर वे क्षेत्र होते हैं जिनकी आबादी 5,000 से अधिक होती है तथा जो जनसंख्या घनत्व और गैर-कृषि कार्यबल से संबंधित निर्धारित मानकों को पूरा करते हैं। दूसरी ओर, वैधानिक नगर वे क्षेत्र होते हैं जिन्हें राज्य सरकारों द्वारा नगर निगम, नगर परिषद या अन्य शहरी स्थानीय निकाय के रूप में अधिसूचित किया गया होता है।
डिग्री ऑफ अर्बनाइजेशन फ्रेमवर्क क्या है?
डिग्री ऑफ अर्बनाइजेशन एक सांख्यिकीय ढांचा है जिसका उपयोग संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं बस्तियों को उनके निर्मित क्षेत्र, जनसंख्या घनत्व और भौगोलिक निरंतरता के आधार पर वर्गीकृत करने के लिए करती हैं। भारत में इस ढांचे के संशोधित संस्करण का उपयोग उन शहरी क्षेत्रों की पहचान करने के लिए किया गया है जो पारंपरिक प्रशासनिक सीमाओं से बाहर विकसित हो चुके हैं। इससे वास्तविक शहरीकरण की स्थिति को अधिक सटीक रूप से समझने में सहायता मिलती है।
कार्यात्मक शहरी बस्तियों की अवधारणा
कार्यात्मक शहरी बस्तियां ऐसे क्षेत्र होते हैं जो निरंतर निर्मित संरचनाओं, आवागमन संबंधों, रोजगार केंद्रों और सेवा सुविधाओं के कारण शहरी स्वरूप में कार्य करते हैं। भले ही वे प्रशासनिक रूप से शहर घोषित न किए गए हों, लेकिन उनकी आर्थिक और सामाजिक गतिविधियां शहरी क्षेत्रों जैसी होती हैं। इन क्षेत्रों की पहचान के लिए नई पद्धति में उपग्रह आधारित रात्रिकालीन प्रकाश तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। इस तकनीक के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में कृत्रिम रोशनी के पैटर्न का अध्ययन किया जाता है, जिससे शहरी विस्तार और गतिविधियों का आकलन किया जा सकता है।
शहरी आबादी के अनुमान में अंतर
राष्ट्रीय शहरी मामलों के संस्थान ने केरल, मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों में सैकड़ों कार्यात्मक शहरी बस्तियों की पहचान की है। डिग्री ऑफ अर्बनाइजेशन ढांचे पर आधारित एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2025 में भारत की लगभग 84 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्रों में निवास कर रही थी। इसके विपरीत, सरकार के वर्तमान आधिकारिक अनुमान के अनुसार भारत की शहरी आबादी लगभग 36 प्रतिशत है। यह अंतर इस बात को दर्शाता है कि पारंपरिक और कार्यात्मक शहरीकरण की परिभाषाओं में महत्वपूर्ण भिन्नता मौजूद है।
शहरों की नई श्रेणीकरण प्रणाली पर विचार
भारत में वर्तमान में टियर-1, टियर-2, टियर-3, टियर-4 और टियर-5 शहरों का वर्गीकरण विभिन्न नीतिगत उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाता है। अब इन श्रेणियों के लिए एक समान और मानकीकृत ढांचा विकसित करने पर विचार किया जा रहा है। यह नया वर्गीकरण निवेश, अवसंरचना विकास, सार्वजनिक सेवाओं और क्षेत्रीय नियोजन को अधिक प्रभावी बनाने में सहायता कर सकता है। प्रस्तावित व्यवस्था में टियर-1 शहरों के लिए भी जनसंख्या आधारित उप-श्रेणियां शामिल किए जाने की संभावना है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- जनगणना नगर के लिए न्यूनतम जनसंख्या सीमा 5,000 निर्धारित की गई है।
- डिग्री ऑफ अर्बनाइजेशन ढांचा संयुक्त राष्ट्र द्वारा उपयोग किया जाने वाला शहरी वर्गीकरण मॉडल है।
- राष्ट्रीय शहरी मामलों के संस्थान ने कई राज्यों में कार्यात्मक शहरी बस्तियों की पहचान की है।
- शहरी क्षेत्रों का वर्गीकरण जनगणना, नगर नियोजन और अवसंरचना आवंटन को प्रभावित करता है।
भारत में शहरीकरण तेजी से बदल रहा है और पारंपरिक प्रशासनिक सीमाएं कई बार वास्तविक शहरी विस्तार को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं कर पाती हैं। ऐसे में कार्यात्मक शहरी बस्तियों की पहचान और नए वर्गीकरण ढांचे पर विचार भविष्य की शहरी नीतियों, संसाधन आवंटन और विकास योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।