भारत के डेटा सेंटरों पर बढ़ता तापीय दबाव

भारत के डेटा सेंटरों पर बढ़ता तापीय दबाव

भारत का डेटा सेंटर क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहा है, लेकिन इसके साथ ही अत्यधिक गर्मी एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है। बढ़ते तापमान के कारण डेटा सेंटरों में शीतलन की मांग, बिजली की खपत और जल उपयोग में उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है। विशेष रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित डेटा सेंटरों के लिए यह समस्या और गंभीर है, क्योंकि इन केंद्रों में अत्यधिक कंप्यूटिंग क्षमता का उपयोग होता है। हालिया जोखिम आकलनों में तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक में प्रस्तावित एआई डेटा सेंटरों को अत्यधिक गर्मी से परिचालन बाधा के उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में शामिल किया गया है।

डेटा सेंटर और ताप प्रबंधन की आवश्यकता

डेटा सेंटर ऐसे विशेष परिसर होते हैं जहां सर्वर, स्टोरेज सिस्टम और नेटवर्किंग उपकरणों के माध्यम से डिजिटल डेटा का भंडारण, प्रसंस्करण और वितरण किया जाता है। आधुनिक एआई डेटा सेंटर और उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग सुविधाएं पारंपरिक सर्वर कक्षों की तुलना में कहीं अधिक गर्मी उत्पन्न करती हैं क्योंकि इनमें सघन हार्डवेयर और निरंतर कार्यभार का उपयोग किया जाता है। पारंपरिक एयर कूलिंग तकनीकें उच्च घनत्व वाले एआई वातावरण में पर्याप्त नहीं मानी जातीं। इसलिए अब लिक्विड कूलिंग तकनीक का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। इस तकनीक में पानी या विशेष तरल पदार्थों के माध्यम से सीधे सर्वर और चिप्स से गर्मी हटाई जाती है। भारत का डेटा सेंटर लिक्विड कूलिंग बाजार 2024 में लगभग 166.69 मिलियन अमेरिकी डॉलर का था, जिसके 2032 तक 958.74 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।

अत्यधिक गर्मी और परिचालन जोखिम

जोखिम मॉडलिंग संस्था एक्सडीआई के आकलन के अनुसार तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक में प्रस्तावित डेटा सेंटर वैश्विक स्तर पर अत्यधिक गर्मी से प्रभावित होने वाले शीर्ष जोखिम क्षेत्रों में शामिल हैं। भारत में प्रस्तावित 41 नए डेटा सेंटरों का अध्ययन किया गया, जिनमें से 12 प्रतिशत को उच्च जोखिम वाली संपत्तियों की श्रेणी में रखा गया। आकलन के अनुसार 2026 से 2100 के बीच औसत क्षति जोखिम में लगभग 269 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। इसके अलावा, वर्ष 2040 तक भारत के लगभग 90 प्रतिशत डेटा सेंटर लंबे समय तक रहने वाले तापीय दबाव का सामना कर सकते हैं। वर्तमान में भी आधे से अधिक डेटा सेंटर ऐसे क्षेत्रों में स्थित हैं जहां साल में 90 दिनों से अधिक समय तक तापमान 35 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहता है।

बेंगलुरु का बढ़ता डेटा सेंटर क्लस्टर

बेंगलुरु भारत के प्रमुख डेटा सेंटर केंद्रों में से एक बन चुका है। यहां वर्तमान में 31 डेटा सेंटर संचालित हैं और दो नए केंद्र निर्माणाधीन हैं। हालांकि, इस तेजी से बढ़ते डेटा सेंटर क्लस्टर के कारण शहरी ताप द्वीप प्रभाव, वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और जल खपत जैसी चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। शहरी ताप द्वीप प्रभाव वह स्थिति है जिसमें अत्यधिक निर्मित शहरी क्षेत्रों का तापमान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक हो जाता है। इसके पीछे कंक्रीट संरचनाएं, हरित क्षेत्रों की कमी और भवनों तथा वाहनों से निकलने वाली ऊष्मा प्रमुख कारण होते हैं।

सरकारी पहल और भविष्य की दिशा

भारत सरकार ने अप्रैल 2025 में राष्ट्रीय डेटा सेंटर मिशन की शुरुआत की थी। इस मिशन का लक्ष्य देश में 100 ग्रीन-प्रमाणित डेटा सेंटर विकसित करना है। ग्रीन डेटा सेंटर ऊर्जा दक्ष प्रणालियों, कम उत्सर्जन वाले ऊर्जा स्रोतों और जल संरक्षण आधारित शीतलन तकनीकों का उपयोग करते हैं। इसके साथ ही भारत ने वर्ष 2035 तक 5 गीगावाट एआई अवसंरचना मंच विकसित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। बड़े एआई डेटा सेंटरों के संचालन के लिए विशाल भूमि, निरंतर बिजली आपूर्ति और पर्याप्त जल संसाधनों की आवश्यकता होती है, इसलिए टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों का महत्व लगातार बढ़ रहा है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • डेटा सेंटरों को कई देशों में महत्वपूर्ण डिजिटल अवसंरचना माना जाता है क्योंकि वे क्लाउड सेवाओं, बैंकिंग, दूरसंचार और सरकारी डेटाबेस का समर्थन करते हैं।
  • लिक्विड कूलिंग तकनीक में पानी या विशेष तरल पदार्थों की मदद से सर्वर और चिप्स की गर्मी को नियंत्रित किया जाता है।
  • एआई मॉडल प्रशिक्षण और उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग प्रणालियां सामान्य सर्वरों की तुलना में अधिक ऊष्मा उत्पन्न करती हैं।
  • शहरी ताप द्वीप प्रभाव पर्यावरण और शहरी भूगोल से संबंधित प्रतियोगी परीक्षाओं का एक महत्वपूर्ण विषय है।

भारत में डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ डेटा सेंटरों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। हालांकि, जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के कारण इनके संचालन पर नए जोखिम उभर रहे हैं। ऐसे में ऊर्जा दक्षता, ग्रीन तकनीकों और उन्नत शीतलन प्रणालियों को अपनाना भविष्य के डेटा सेंटर विकास के लिए अत्यंत आवश्यक होगा।

Originally written on June 20, 2026 and last modified on June 20, 2026.

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