उत्तराखंड में खुली पहली जीआई उत्पाद गैलरी, राज्य की पारंपरिक धरोहर को मिलेगा नया मंच
उत्तराखंड ने 13 जुलाई 2026 को हल्द्वानी स्थित उत्तराखंड फॉरेस्ट ट्रेनिंग अकादमी में राज्य की पहली भौगोलिक संकेतक (जीआई) उत्पाद गैलरी का उद्घाटन किया। इस गैलरी में राज्य के 30 से अधिक जीआई टैग प्राप्त उत्पादों को प्रदर्शित किया गया है। इनमें कृषि उत्पाद, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े पारंपरिक उत्पाद शामिल हैं। इस पहल का उद्देश्य उत्तराखंड की विशिष्ट पहचान वाले उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना तथा स्थानीय किसानों, कारीगरों और शिल्पकारों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराना है।
जीआई टैग क्या है और इसका महत्व
भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication-GI) एक ऐसा चिन्ह है, जो उन उत्पादों को दिया जाता है जिनकी गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या विशेषताएं किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती हैं। भारत में जीआई पंजीकरण भौगोलिक संकेतक वस्तु (पंजीकरण एवं संरक्षण) अधिनियम, 1999 के अंतर्गत किया जाता है। इसका पंजीकरण भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री, जो पेटेंट, डिज़ाइन एवं ट्रेडमार्क महानियंत्रक के अधीन कार्य करती है, द्वारा संचालित किया जाता है। जीआई टैग किसी उत्पाद की मौलिकता की रक्षा करने के साथ-साथ नकली उत्पादों पर रोक लगाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
गैलरी में प्रदर्शित प्रमुख उत्पाद
हल्द्वानी की इस गैलरी में उत्तराखंड के अनेक प्रसिद्ध जीआई उत्पादों को स्थान दिया गया है। इनमें बेडू, रामनगर की लीची, रामगढ़ का आड़ू, तेजपात, मुनस्यारी का सफेद राजमा, कुमाऊं का च्यूरा तेल और अल्मोड़ा की लाखोरी मिर्च प्रमुख हैं। इसके अलावा राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाने वाले ऐपन कला, चमोली के लकड़ी से बने राममाण मुखौटे तथा उत्तराखंड के पारंपरिक ताम्र शिल्प (तमटा कॉपरवेयर) भी प्रदर्शित किए गए हैं। नाशवान उत्पादों जैसे लीची और आड़ू को विशेष संरक्षण तकनीकों के माध्यम से सुरक्षित रखकर प्रदर्शित किया गया है।
उत्तराखंड में जीआई उत्पादों का विस्तार
उत्तराखंड में वर्तमान में 30 से अधिक उत्पादों को जीआई टैग प्राप्त हो चुका है। विशेष रूप से दिसंबर 2023 में राज्य को एक ही दिन में 18 नए जीआई टैग मिले थे, जिससे यह एक ही चरण में सर्वाधिक जीआई पंजीकरण प्राप्त करने वाले राज्यों में शामिल हो गया। इससे राज्य के पारंपरिक कृषि उत्पादों, हस्तशिल्प और स्थानीय कला को नई पहचान मिली है तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिली है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- जीआई टैग उन उत्पादों को दिया जाता है जिनकी गुणवत्ता और पहचान किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती है।
- भारत में जीआई पंजीकरण भौगोलिक संकेतक वस्तु (पंजीकरण एवं संरक्षण) अधिनियम, 1999 के तहत किया जाता है।
- उत्तराखंड के जीआई उत्पादों में कृषि उत्पादों के साथ-साथ हस्तशिल्प और पारंपरिक कलाएं भी शामिल हैं।
- नाशवान जीआई उत्पादों जैसे लीची और आड़ू को प्रदर्शित करने के लिए विशेष संरक्षण तकनीकों का उपयोग किया जाता है।
हल्द्वानी में स्थापित यह पहली जीआई उत्पाद गैलरी उत्तराखंड की सांस्कृतिक और कृषि विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह पहल न केवल राज्य के पारंपरिक उत्पादों को व्यापक पहचान दिलाएगी, बल्कि किसानों, शिल्पकारों और स्थानीय समुदायों की आजीविका को भी सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देगी।