उदयपुर में 30 वर्ष बाद फिर दिखा दुर्लभ लौदांकिया वाइन स्नेक

उदयपुर में 30 वर्ष बाद फिर दिखा दुर्लभ लौदांकिया वाइन स्नेक

राजस्थान के उदयपुर स्थित उबेश्वर वन्यजीव क्षेत्र में 12 जुलाई 2026 को दुर्लभ लौदांकिया वाइन स्नेक (अहेतुला लौदांकिया) का सफलतापूर्वक दस्तावेजीकरण किया गया। इस दुर्लभ प्रजाति की तस्वीर वन्यजीव फोटोग्राफर रोहित द्विवेदी ने शरद अग्रवाल और दीपल कालरा के मार्गदर्शन में ली। लगभग तीन दशक बाद उदयपुर क्षेत्र में इस प्रजाति का यह पहला आधिकारिक रिकॉर्ड माना जा रहा है। यह खोज अरावली क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण के महत्व को एक बार फिर उजागर करती है।

लौदांकिया वाइन स्नेक की विशेषताएं

लौदांकिया वाइन स्नेक का वैज्ञानिक नाम अहेतुला लौदांकिया (Ahaetulla laudankia) है। इस प्रजाति का वैज्ञानिक वर्णन पहली बार वर्ष 2019 में किया गया था और यह पूरी तरह भारत में पाई जाने वाली स्थानिक (एंडेमिक) प्रजाति है। यह वाइन स्नेक समूह का सदस्य है, जिसकी पहचान इसके लंबे, पतले और वृक्षों पर रहने के लिए अनुकूलित शरीर से होती है। इस सांप का रंग चेस्टनट-भूरा होता है, जिस पर बारीक काले धब्बे दिखाई देते हैं। इसके सिर के निचले हिस्से पर हल्के सफेद धब्बे इसकी एक विशिष्ट पहचान हैं। सामान्यतः इसकी लंबाई 80 सेंटीमीटर से 1.5 मीटर तक होती है। यह दिन के समय सक्रिय रहने वाली (दिवाचर) प्रजाति है।

आवास और व्यवहार

लौदांकिया वाइन स्नेक मुख्य रूप से शुष्क पर्णपाती वनों, झाड़ीदार क्षेत्रों और पहाड़ी ढलानों में पाया जाता है। यह एक वृक्षवासी (आर्बोरियल) प्रजाति है, जो अपना अधिकांश समय पेड़ों और झाड़ियों पर बिताती है। यह हल्का विषैला तथा रियर-फैंग्ड (पीछे की ओर स्थित विषदंत वाला) सांप है। इसका विष मुख्यतः छोटे शिकार को नियंत्रित करने के लिए उपयोग होता है और सामान्य परिस्थितियों में यह मनुष्यों के लिए अत्यधिक खतरनाक नहीं माना जाता।

उदयपुर में पुनः रिकॉर्ड होने का महत्व

उदयपुर क्षेत्र में इस प्रजाति का लगभग 30 वर्षों बाद पुनः रिकॉर्ड होना वन्यजीव संरक्षण के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे पहले इस क्षेत्र में इसका अंतिम ज्ञात रिकॉर्ड राजस्थान वन सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी एवं वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. सतीश शर्मा द्वारा दर्ज किया गया था। उबेश्वर क्षेत्र अरावली पर्वतमाला का हिस्सा है, जो अपनी समृद्ध जैव विविधता, शुष्क वन, झाड़ीदार वनस्पति और विविध सरीसृप प्रजातियों के लिए प्रसिद्ध है। यह खोज दर्शाती है कि उचित संरक्षण के माध्यम से दुर्लभ प्रजातियों का प्राकृतिक आवास अब भी सुरक्षित रखा जा सकता है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • अहेतुला लौदांकिया (Ahaetulla laudankia) का वैज्ञानिक वर्णन वर्ष 2019 में किया गया था।
  • यह प्रजाति भारत की स्थानिक (एंडेमिक) प्रजाति है और केवल भारत में प्राकृतिक रूप से पाई जाती है।
  • रियर-फैंग्ड सांपों में विषदंत मुंह के पिछले हिस्से में होते हैं, जिनकी सहायता से वे अपने शिकार को वश में करते हैं।
  • दिवाचर (Diurnal) जीव दिन के समय सक्रिय रहते हैं, जबकि रात्रिचर जीव रात में सक्रिय होते हैं।

उदयपुर के उबेश्वर क्षेत्र में लौदांकिया वाइन स्नेक का पुनः दस्तावेजीकरण न केवल राजस्थान की समृद्ध जैव विविधता का प्रमाण है, बल्कि यह वन्यजीव संरक्षण के महत्व को भी रेखांकित करता है। इस प्रकार की खोजें वैज्ञानिक अनुसंधान को नई दिशा देने के साथ-साथ दुर्लभ और स्थानिक प्रजातियों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

Originally written on July 14, 2026 and last modified on July 14, 2026.

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