भारत की पहली स्वदेशी अफ्रीकी स्वाइन फीवर वैक्सीन से सुअर पालन को राहत

भारत की पहली स्वदेशी अफ्रीकी स्वाइन फीवर वैक्सीन से सुअर पालन को राहत

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने देश की पहली स्वदेशी अफ्रीकी स्वाइन फीवर (ASF) वैक्सीन विकसित करने की घोषणा की है। यह वैक्सीन सुअरों में फैलने वाली इस घातक बीमारी के खिलाफ एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि मानी जा रही है, क्योंकि अब तक इसके नियंत्रण के लिए मुख्य रूप से जैव-सुरक्षा, आवाजाही नियंत्रण, संक्रमित पशुओं का निस्तारण और निगरानी जैसे उपायों पर निर्भर रहना पड़ता था।

क्यों अहम है यह वैक्सीन

अफ्रीकी स्वाइन फीवर घरेलू सुअरों और जंगली सूअरों में फैलने वाला अत्यधिक संक्रामक वायरल रोग है। यह मनुष्यों को संक्रमित नहीं करता, लेकिन सुअर पालन क्षेत्र में भारी मृत्यु दर और आर्थिक नुकसान का कारण बनता है। भारत में यह बीमारी खासकर पूर्वोत्तर राज्यों में छोटे और घरेलू स्तर के पशुपालकों की आय और स्थानीय मांस आपूर्ति पर असर डालती रही है।आईसीएआर ने यह वैक्सीन भोपाल स्थित आईसीएआर-राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग संस्थान (ICAR-NIHSAD) में विकसित की है। इसे 98वें आईसीएआर स्थापना दिवस के अवसर पर 16 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में राष्ट्र को समर्पित किया गया था। बाद में 4 अगस्त 2026 को इसकी आधिकारिक घोषणा की गई।

वैक्सीन की तकनीकी खासियत

यह भारत की पहली MA-104 सेल लाइन आधारित लाइव एटेन्यूएटेड ASF वैक्सीन है। इसमें ASFV जीनोटाइप II का एक कमजोर किया गया स्वरूप इस्तेमाल किया गया है। यही जीनोटाइप एशिया और यूरोप में कई प्रकोपों से जुड़ा रहा है।वैक्सीन की जांच प्रयोगशाला स्तर पर कई मानकों पर की गई, जिनमें स्टरलिटी, शुद्धता, सुरक्षा, आनुवंशिक स्थिरता, इम्युनोजेनेसिटी, सुरक्षा-क्षमता और वायरस के फिर से अधिक विषैला बनने की संभावना शामिल थी। इसके साथ ही इसे पशुपालन एवं डेयरी विभाग के साथ फील्ड स्तर पर भी परखा गया।यह वैक्सीन स्वस्थ सुअरों के लिए, जिनकी उम्र आठ सप्ताह से अधिक हो, उपयोग के लिए सुझाई गई है। इसे 1 मिलीलीटर की इंट्रामस्क्युलर इंजेक्शन के रूप में दिया जाता है और 14 दिन बाद बूस्टर डोज़ दी जाती है।

आर्थिक नुकसान और नियंत्रण की चुनौती

ASF ने भारत में पहले भी बड़े आर्थिक नुकसान पहुंचाए हैं। असम में 2020-21 के दौरान लगभग 276 करोड़ रुपये का नुकसान दर्ज किया गया, जबकि मिजोरम में 2025 तक यह नुकसान करीब 982 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। मिजोरम में इससे 11,382 से अधिक परिवार प्रभावित हुए।ऐसे में स्वदेशी वैक्सीन का विकास केवल वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पशुधन सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण कदम है। विशेषज्ञों के अनुसार, वैक्सीन के बाजार में आने से पहले पेटेंट, नीलामी और किसी फार्मास्युटिकल कंपनी द्वारा उत्पादन जैसी प्रक्रियाएं पूरी होंगी। अनुमान है कि यह लगभग छह महीने में उपलब्ध हो सकती है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • अफ्रीकी स्वाइन फीवर वायरस Asfarviridae परिवार से संबंधित है।
  • यह बीमारी सुअरों और जंगली सूअरों को प्रभावित करती है, लेकिन मनुष्यों में नहीं फैलती।
  • ICAR-NIHSAD भोपाल, मध्य प्रदेश में स्थित है।
  • Live attenuated vaccine में कमजोर किए गए रोगाणु का उपयोग प्रतिरक्षा विकसित करने के लिए किया जाता है।

स्वदेशी ASF वैक्सीन भारत के पशुधन अनुसंधान में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है। यदि इसका सफल व्यावसायिक उत्पादन शुरू होता है, तो यह सुअर पालन से जुड़े किसानों को रोग-जोखिम और आर्थिक नुकसान दोनों से राहत दे सकती है।

Originally written on August 5, 2026 and last modified on August 5, 2026.

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