भारत और जर्मनी के बीच पनडुब्बी सहयोग समझौता अंतिम चरण में

भारत और जर्मनी के बीच पनडुब्बी सहयोग समझौता अंतिम चरण में

भारत और जर्मनी के बीच भारतीय नौसेना के लिए छह अत्याधुनिक एचडीडब्ल्यू क्लास 214 पनडुब्बियों की खरीद और निर्माण को लेकर बहु-अरब डॉलर का समझौता अंतिम चरण में पहुंच गया है। लगभग 8 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य का यह प्रस्तावित समझौता भारत की प्रमुख पनडुब्बी अधिग्रहण परियोजना ‘प्रोजेक्ट 75-आई’ के अंतर्गत किया जा रहा है। इस सौदे की विशेषता यह है कि इसमें उन्नत तकनीक हस्तांतरण के साथ भारत में ही पनडुब्बियों का निर्माण किया जाएगा।

क्या है प्रोजेक्ट 75-आई

प्रोजेक्ट 75-आई भारतीय नौसेना का एक महत्वपूर्ण आधुनिकीकरण कार्यक्रम है, जिसके तहत छह आधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियों का अधिग्रहण किया जाना है। इन पनडुब्बियों को उन्नत युद्धक क्षमता, बेहतर स्टील्थ तकनीक और लंबी अवधि तक पानी के भीतर संचालन की विशेषताओं से लैस किया जाएगा। यह परियोजना भारतीय नौसेना की समुद्री सुरक्षा क्षमता को मजबूत करने के उद्देश्य से शुरू की गई है।

एचडीडब्ल्यू क्लास 214 पनडुब्बियों की विशेषताएं

एचडीडब्ल्यू क्लास 214 एक आधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बी श्रेणी है, जिसे जर्मनी में विकसित किया गया है। इसका उपयोग कई देशों की नौसेनाएं समुद्री निगरानी, रणनीतिक गश्त और युद्धक अभियानों के लिए करती हैं। इन पनडुब्बियों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआईपी) प्रणाली है, जो उन्हें लंबे समय तक पानी के भीतर रहने में सक्षम बनाती है।

तकनीक हस्तांतरण और भारत में निर्माण

प्रस्तावित समझौते के अनुसार पनडुब्बियों का निर्माण भारत में मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड द्वारा जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स के सहयोग से किया जाएगा। इस परियोजना में व्यापक तकनीक हस्तांतरण शामिल है, जिसमें एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन जैसी उन्नत प्रणालियां भी शामिल हैं। इससे भारत की स्वदेशी रक्षा निर्माण क्षमता को महत्वपूर्ण बढ़ावा मिलेगा।

निर्माण और डिलीवरी की समयसीमा

योजना के अनुसार समझौते पर हस्ताक्षर होने के लगभग सात वर्ष बाद पहली पनडुब्बी भारतीय नौसेना को सौंपी जा सकती है। मझगांव डॉक में प्रारंभिक स्टील कटिंग का कार्य 2026 के अंत तक शुरू होने की संभावना है। पहली पनडुब्बी के समुद्री परीक्षण वर्ष 2031 तक शुरू होने का अनुमान है। यह परियोजना दीर्घकालिक रक्षा उत्पादन और तकनीकी विकास के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

रणनीतिक महत्व

यह समझौता भारत के सबसे बड़े रक्षा सौदों में से एक माना जा रहा है। विशेष बात यह है कि जर्मनी ने इससे पहले यूरोप के बाहर किसी देश को इतनी व्यापक पनडुब्बी निर्माण तकनीक हस्तांतरित नहीं की है। यह भारत-जर्मनी रक्षा सहयोग में एक नए अध्याय की शुरुआत कर सकता है और भारत की ‘आत्मनिर्भर रक्षा’ नीति को भी मजबूती देगा।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

” एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआईपी) तकनीक पारंपरिक पनडुब्बियों को लंबे समय तक पानी के भीतर रहने में सक्षम बनाती है। ” मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड मुंबई स्थित भारत का प्रमुख युद्धपोत और पनडुब्बी निर्माण शिपयार्ड है। ” थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स जर्मनी की प्रमुख रक्षा और पनडुब्बी निर्माण कंपनी है। ” प्रोजेक्ट 75-आई भारतीय नौसेना की महत्वपूर्ण पनडुब्बी अधिग्रहण परियोजनाओं में से एक है। * डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां अपनी कम ध्वनि और उच्च स्टील्थ क्षमता के कारण सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। भारत और जर्मनी के बीच प्रस्तावित यह समझौता केवल पनडुब्बियों की खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन्नत रक्षा तकनीक, स्वदेशी निर्माण क्षमता और रणनीतिक साझेदारी को भी नई दिशा देगा। इसके सफल क्रियान्वयन से भारतीय नौसेना की समुद्री शक्ति और आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन दोनों को महत्वपूर्ण लाभ मिलने की उम्मीद है।

Originally written on May 31, 2026 and last modified on May 31, 2026.

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