भारतीय वायुसेना के लिए ब्रिटेन से आएंगे सेवानिवृत्त जगुआर विमान

भारतीय वायुसेना के लिए ब्रिटेन से आएंगे सेवानिवृत्त जगुआर विमान

भारत वर्ष 2026 में यूनाइटेड किंगडम से नौ सेवानिवृत्त सेपेकैट जगुआर लड़ाकू विमान प्राप्त करने जा रहा है। इन विमानों का उपयोग सक्रिय उड़ान अभियानों के लिए नहीं किया जाएगा, बल्कि इनके पुर्जों और उप-प्रणालियों को निकालकर भारतीय वायुसेना के मौजूदा जगुआर बेड़े के रखरखाव में लगाया जाएगा। विमानन क्षेत्र में इस प्रक्रिया को “कैनिबलाइजेशन” कहा जाता है। यह कदम भारतीय वायुसेना के पुराने लेकिन अभी भी महत्वपूर्ण जगुआर लड़ाकू विमानों की सेवा अवधि बढ़ाने में सहायक माना जा रहा है।

सेपेकैट जगुआर विमान क्या है?

सेपेकैट जगुआर एक दो इंजन वाला स्ट्राइक और ग्राउंड-अटैक लड़ाकू विमान है, जिसे यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस ने संयुक्त रूप से विकसित किया था। इसका निर्माण सेपेकैट नामक ब्रिटिश-फ्रांसीसी कंसोर्टियम द्वारा किया गया था। यह विमान 1970 के दशक में सेवा में शामिल हुआ था और अपनी सटीक हमलावर क्षमता के कारण कई वर्षों तक विभिन्न वायु सेनाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहा। हालांकि अब इसका उत्पादन बंद हो चुका है और अधिकांश देशों ने इसे सेवा से हटा दिया है, फिर भी भारतीय वायुसेना आज भी इस विमान का संचालन कर रही है। वर्तमान में भारत दुनिया का एकमात्र देश है जिसकी सैन्य सेवा में जगुआर लड़ाकू विमान सक्रिय रूप से कार्यरत हैं।

भारतीय वायुसेना में जगुआर की भूमिका

भारतीय वायुसेना के पास लगभग 115 से 120 जगुआर विमान हैं और इनके 2030 से 2032 तक सेवा में बने रहने की संभावना है। जगुआर विमानों की छह स्क्वाड्रन अंबाला, गोरखपुर और जामनगर जैसे महत्वपूर्ण वायुसेना ठिकानों पर तैनात हैं। ये विमान मुख्य रूप से स्ट्राइक मिशन, जमीनी लक्ष्यों पर हमले और सामरिक अभियानों के लिए उपयोग किए जाते हैं। अपनी उम्र के बावजूद जगुआर अभी भी भारतीय वायुसेना की आक्रमण क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।

स्पेयर पार्ट्स के लिए सेवानिवृत्त विमानों का उपयोग

जगुआर विमान अब उत्पादन में नहीं हैं, इसलिए इनके नए पुर्जों की उपलब्धता सीमित हो गई है। इसी कारण भारत समय-समय पर अन्य देशों से सेवानिवृत्त जगुआर विमान खरीदकर उनके उपयोगी भागों को निकालता रहा है। भारत ने वर्ष 2018 में फ्रांस और वर्ष 2025 में ओमान से भी ऐसे जगुआर विमान प्राप्त किए थे। इनसे प्राप्त पुर्जों का उपयोग सक्रिय विमानों के रखरखाव और उनकी परिचालन क्षमता बनाए रखने के लिए किया गया था। ब्रिटेन से आने वाले नौ विमान भी इसी उद्देश्य की पूर्ति करेंगे।

पुनः इंजन लगाने की योजना और चुनौतियां

भारतीय वायुसेना ने जगुआर बेड़े को आधुनिक बनाने के लिए हनीवेल के एफ-125आईएन टर्बोफैन इंजन के साथ पुनः इंजन लगाने की योजना पर विचार किया था। इस परियोजना का उद्देश्य विमानों की प्रदर्शन क्षमता बढ़ाना था, लेकिन लागत में लगातार वृद्धि होने के कारण यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका। इसके बाद वायुसेना ने मौजूदा विमानों के रखरखाव और सेवा जीवन विस्तार पर अधिक ध्यान केंद्रित किया। सेवानिवृत्त विमानों से प्राप्त पुर्जे इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • सेपेकैट जगुआर एक दो इंजन वाला स्ट्राइक विमान है, जिसे ब्रिटेन और फ्रांस ने संयुक्त रूप से विकसित किया था।
  • भारतीय वायुसेना वर्तमान में जगुआर लड़ाकू विमान की एकमात्र सक्रिय सैन्य संचालक है।
  • विमानन क्षेत्र में “कैनिबलाइजेशन” का अर्थ सेवानिवृत्त विमानों से उपयोगी पुर्जे निकालकर सक्रिय विमानों में इस्तेमाल करना होता है।
  • भारत पहले फ्रांस और ओमान से भी सेवानिवृत्त जगुआर विमान प्राप्त कर चुका है।

ब्रिटेन से नौ सेवानिवृत्त जगुआर विमानों की खरीद भारतीय वायुसेना की व्यावहारिक और लागत-प्रभावी रखरखाव रणनीति को दर्शाती है। उत्पादन बंद होने के बावजूद जगुआर अभी भी भारत की सामरिक क्षमता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। ऐसे में स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता सुनिश्चित करना और बेड़े को परिचालन रूप से सक्षम बनाए रखना राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

Originally written on June 20, 2026 and last modified on June 20, 2026.

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