प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था में महिलाओं की डिजिटल वित्तीय भागीदारी पर नई रिपोर्ट
भारत की प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था तेजी से फैल रही है, लेकिन इसमें महिलाओं की डिजिटल वित्तीय भागीदारी अब भी पुरुषों की तुलना में काफी पीछे है। नई संयुक्त नीति-संक्षेप रिपोर्ट में यह दिखाया गया है कि डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन बैंकिंग और औपचारिक ऋण तक पहुंच बढ़े बिना महिलाओं के लिए इस उभरते रोजगार क्षेत्र में अवसर सीमित रहेंगे।
प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था में रोजगार का विस्तार
नई दिल्ली में 24 अगस्त 2026 को अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च ने “Advancing Women’s Digital Financial Inclusion in the Platform Economy” शीर्षक नीति-संक्षेप जारी किया। इसमें भारत की प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था में काम करने वालों की संख्या, महिलाओं की भागीदारी और वित्तीय सेवाओं तक उनकी पहुंच का विश्लेषण किया गया।
प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था से आशय ऐसे काम से है जो डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए ग्राहकों, सेवा प्रदाताओं और कामगारों को जोड़ता है। भारत में प्लेटफॉर्म कार्यबल 2020 में 7.7 मिलियन से बढ़कर FY25 में 12 मिलियन हो गया है और 2029-30 तक इसके 23.5 मिलियन तक पहुंचने का अनुमान है।
महिलाओं की भागीदारी और डिजिटल अंतर
रिपोर्ट के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में दोपहिया डिलीवरी ड्राइवरों में महिलाओं की हिस्सेदारी 1% से भी कम है। यह तथ्य बताता है कि प्लेटफॉर्म आधारित काम में महिलाओं की भागीदारी अभी भी बहुत सीमित है।
डिजिटल वित्तीय समावेशन का मतलब है डिजिटल भुगतान प्रणाली, ऑनलाइन बैंकिंग और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से औपचारिक वित्तीय सेवाओं तक पहुंच। भारत में महिलाओं के बैंक खाते रखने की दर 2014 में 43% से बढ़कर 2024 में 89% हो गई, लेकिन डिजिटल वित्तीय उपयोग में अंतर अब भी बड़ा है। 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की केवल 25.2% भारतीय महिलाएं ऑनलाइन बैंकिंग लेनदेन कर सकती थीं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 47.1% था।
ऋण, डेटा और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना की भूमिका
रिपोर्ट में कहा गया है कि प्लेटफॉर्म भुगतान के डिजिटल रिकॉर्ड के आधार पर कैश फ्लो-आधारित ऋण महिलाओं के लिए उपयोगी हो सकता है। पारंपरिक ऋण व्यवस्था में जमीन या संपत्ति जैसी जमानत की जरूरत होती है, जो कई महिलाओं के पास नहीं होती। ऐसे में आय के डिजिटल रिकॉर्ड से उनकी पुनर्भुगतान क्षमता का आकलन किया जा सकता है।
रिपोर्ट ने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना की भूमिका पर भी जोर दिया, जिसमें Account Aggregator ढांचा और e-Shram रिकॉर्ड शामिल हैं। इनसे सहमति-आधारित डेटा साझा करना, वित्तीय जानकारी की पोर्टेबिलिटी और ऋण तक बेहतर पहुंच संभव हो सकती है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष एजेंसी है, जिसकी स्थापना 1919 में हुई थी।
- नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च भारत के सबसे पुराने स्वतंत्र आर्थिक नीति शोध संस्थानों में से एक है।
- Account Aggregator ढांचा भारत की डिजिटल वित्तीय संरचना का हिस्सा है और यह सहमति-आधारित डेटा साझा करने की सुविधा देता है।
- e-Shram पोर्टल भारत में असंगठित कामगारों का राष्ट्रीय डेटाबेस है।
यह रिपोर्ट संकेत देती है कि महिलाओं के लिए केवल बैंक खाता होना पर्याप्त नहीं है; डिजिटल कौशल, वित्तीय डेटा तक पहुंच और ऋण के नए मॉडल भी जरूरी हैं। प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था में उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए यही सबसे अहम शर्तें हैं।