पश्चिमी घाट के लिए ईएसए का नया मसौदा, पर्यावरण संरक्षण पर फिर चर्चा तेज

पश्चिमी घाट के लिए ईएसए का नया मसौदा, पर्यावरण संरक्षण पर फिर चर्चा तेज

केंद्र सरकार ने पश्चिमी घाट के लिए पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र यानी ईएसए का सातवां मसौदा जारी किया है। 27 जुलाई 2026 को जारी इस प्रस्ताव में 56,825.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को छह राज्यों में शामिल किया गया है। यह कदम पश्चिमी घाट की नाजुक पारिस्थितिकी, जैव विविधता और विकास गतिविधियों के बीच संतुलन को लेकर चल रही बहस को फिर सामने लाता है।

पश्चिमी घाट क्यों हैं इतने अहम

पश्चिमी घाट भारत की पश्चिमी सीमा के साथ फैली पर्वत श्रृंखला है, जिसे दुनिया के प्रमुख जैव विविधता हॉटस्पॉट में गिना जाता है। यह क्षेत्र जंगलों, घासभूमियों, नदियों और पहाड़ी पारिस्थितिक तंत्रों का संगम है। यही वजह है कि यहां किसी भी तरह की भूमि-उपयोग नीति, खनन, निर्माण या औद्योगिक गतिविधि का असर सीधे पर्यावरण और स्थानीय जीवन पर पड़ सकता है।यह पर्वत श्रृंखला गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु से होकर गुजरती है। मसौदे में कर्नाटक के लिए 20,668 वर्ग किलोमीटर, महाराष्ट्र के लिए 17,340 वर्ग किलोमीटर, केरल के लिए 9,993.7 वर्ग किलोमीटर, तमिलनाडु के लिए 6,914 वर्ग किलोमीटर, गोवा के लिए 1,461 वर्ग किलोमीटर और गुजरात के लिए 449 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र प्रस्तावित है। गोवा में 108 गांवों को प्रस्तावित ईएसए में बरकरार रखा गया है।

ईएसए का मतलब और क्या होंगे नियम

पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत अधिसूचित किया जाता है। इसका उद्देश्य उन इलाकों की रक्षा करना होता है जहां पारिस्थितिकी बेहद नाजुक है और मानवीय गतिविधियों से नुकसान की आशंका अधिक रहती है। अंतिम रूप से अधिसूचित ईएसए में खनन, क्वारी, रेत खनन, नए थर्मल पावर प्लांट, कुछ उद्योग और बड़े निर्माण प्रोजेक्ट्स पर रोक लगाई जाती है। जलविद्युत परियोजनाओं को भी नियंत्रित ढंग से अनुमति दी जाती है।इस तरह के प्रावधानों का सीधा असर भूमि उपयोग, स्थानीय रोजगार, बुनियादी ढांचे और पर्यावरणीय सुरक्षा पर पड़ता है। इसलिए पश्चिमी घाट जैसे संवेदनशील क्षेत्र में ईएसए का निर्धारण केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संरक्षण नीति का हिस्सा माना जाता है।

आपत्तियां, सुझाव और आगे की प्रक्रिया

यह मसौदा अब 60 दिनों तक सार्वजनिक आपत्तियों और सुझावों के लिए खुला रहेगा। इसके बाद केंद्र सरकार अंतिम अधिसूचना पर विचार करेगी। राज्यों से मिली आपत्तियों और सुझावों की जांच के लिए संजय कुमार की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति का कार्यकाल जुलाई 2027 तक बढ़ा दिया गया है।पश्चिमी घाट के मामले में केंद्र और छह राज्यों के बीच गांवों की सीमाओं तथा भूमि-उपयोग प्रतिबंधों को लेकर लंबे समय से मतभेद बने हुए हैं। केरल और कर्नाटक ने सीमांकन के कारण आजीविका और विकास पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता जताई है। ऐसे में अंतिम अधिसूचना से पहले संतुलित समाधान तलाशना सरकार के लिए अहम चुनौती बना हुआ है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • पश्चिमी घाट को 2012 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा मिला था।
  • ईएसए की अधिसूचना पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत की जाती है।
  • पश्चिमी घाट गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु से होकर गुजरते हैं।
  • गोवा के सातवें मसौदे में 108 गांव प्रस्तावित ईएसए में शामिल रखे गए हैं।

पश्चिमी घाट के लिए यह मसौदा पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन की बहस को फिर से केंद्र में लाता है। अब निगाहें सार्वजनिक सुझावों और अंतिम अधिसूचना की दिशा पर टिकी रहेंगी।

Originally written on July 29, 2026 and last modified on July 29, 2026.

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