नौसेना को मिली नई एंटी-सबमरीन शैलो वाटर क्राफ्ट ‘मंगरोल’
कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने भारतीय नौसेना को मंगरोल सौंप दिया है, जो स्वदेशी रूप से डिजाइन और निर्मित एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट (ASW SWC) श्रृंखला का तीसरा जहाज है। यह पोत कोच्चि में 21 अगस्त 2026 को डिलीवर किया गया। तटीय और उथले जलक्षेत्रों में संचालन के लिए तैयार यह जहाज कम तीव्रता वाले समुद्री अभियानों, निगरानी और खोज एवं बचाव कार्यों में उपयोगी होगा।
तटीय सुरक्षा के लिए खास तरह का युद्धपोत
ASW SWC श्रेणी के जहाज खास तौर पर समुद्र के किनारी इलाकों और उथले पानी में काम करने के लिए बनाए जाते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य पनडुब्बी-रोधी अभियान, समुद्री निगरानी और जरूरत पड़ने पर खदान बिछाने जैसे कार्य करना होता है। ऐसे प्लेटफॉर्म उन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण माने जाते हैं, जहां बड़े युद्धपोतों की तुलना में अधिक फुर्ती और कम गहराई में संचालन की क्षमता जरूरी होती है।
मंगरोल की तकनीकी क्षमता
मंगरोल 78 मीटर लंबा पोत है और इसे डीजल इंजन-वॉटरजेट प्रोपल्शन प्रणाली से शक्ति मिलती है। वॉटरजेट तकनीक जहाज को उथले पानी में बेहतर गतिशीलता और संचालन क्षमता देती है। इस पोत में शैलो-वाटर सोनार, हल्के टॉरपीडो, स्वदेशी ASW रॉकेट और माइन-लेइंग उपकरण लगाए गए हैं, जिससे यह पानी के भीतर मौजूद खतरों का जवाब देने में सक्षम बनता है।
निर्माण, नामकरण और कार्यक्रम की स्थिति
इस जहाज का निर्माण डिट नॉर्स्के वेरिटास (DNV) की वर्गीकरण नियमावली के अनुसार किया गया है। DNV जहाजों और अपतटीय संरचनाओं के लिए मानक तय करने वाली एक जानी-मानी वर्गीकरण संस्था है। मंगरोल के डिलीवरी प्रोटोकॉल पर कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड में डॉ. हरिकृष्णन एस, निदेशक (ऑपरेशंस), और कमांडर यू शरण कुमार, नामित कमांडिंग ऑफिसर, ने हस्ताक्षर किए। इस पोत का नाम गुजरात के तटीय कस्बे मंगरोल के नाम पर रखा गया है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड का मुख्यालय कोच्चि, केरल में है और यह भारत की प्रमुख जहाज निर्माण कंपनियों में शामिल है।
- ASW SWC का पूरा नाम Anti-Submarine Warfare Shallow Water Craft है।
- वॉटरजेट प्रोपल्शन प्रणाली उथले पानी और उच्च गतिशीलता वाले नौसैनिक प्लेटफॉर्म में उपयोगी मानी जाती है।
- मंगरोल, आठ जहाजों वाली ASW SWC श्रृंखला का तीसरा पोत है; शेष पांच जहाज अलग-अलग निर्माण चरणों में हैं।
मंगरोल की डिलीवरी से भारतीय नौसेना की तटीय युद्ध क्षमता और स्वदेशी निर्माण आधारित बेड़े को मजबूती मिली है। यह कदम समुद्री सुरक्षा, निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।