दवाओं में क्यूआर-कोड ट्रेसबिलिटी का दायरा बढ़ा

दवाओं में क्यूआर-कोड ट्रेसबिलिटी का दायरा बढ़ा

केंद्र सरकार ने दवा सुरक्षा और पारदर्शिता को मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए दवाओं के लिए क्यूआर-कोड आधारित ट्रेसबिलिटी व्यवस्था का विस्तार किया है। 25 जून 2026 को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने ड्रग्स रूल्स, 1945 में संशोधन अधिसूचित किया, जिसके तहत अब टीके, कैंसर-रोधी दवाएं, सभी एंटीमाइक्रोबियल दवाएं, मादक तथा मनःप्रभावी दवाओं पर भी क्यूआर कोड अनिवार्य किया जाएगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य नकली और घटिया दवाओं पर नियंत्रण के साथ-साथ उपभोक्ताओं और नियामक एजेंसियों को दवाओं की आसानी से पहचान और सत्यापन की सुविधा उपलब्ध कराना है।

क्यूआर-कोड आधारित ट्रेसबिलिटी क्या है?

क्यूआर-कोड ट्रेसबिलिटी एक ऐसी डिजिटल पहचान प्रणाली है, जिसके माध्यम से प्रत्येक दवा पैक को मशीन द्वारा पढ़े जाने योग्य जानकारी से जोड़ा जाता है। इस क्यूआर कोड में दवा का विशिष्ट पहचान कोड, जेनेरिक नाम, ब्रांड नाम, निर्माता का विवरण, बैच नंबर, निर्माण तिथि, समाप्ति तिथि तथा निर्माण लाइसेंस संख्या जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध होती हैं। इससे दवा की प्रामाणिकता की जांच करना आसान हो जाता है।

किन दवाओं पर लागू होगा नया नियम?

संशोधित नियम के तहत सभी टीकों, सभी कैंसर-रोधी दवाओं, सभी एंटीमाइक्रोबियल दवाओं (जिनमें एंटीबायोटिक भी शामिल हैं), मादक दवाओं तथा मनःप्रभावी दवाओं को ड्रग्स रूल्स के शेड्यूल H2 के अंतर्गत लाया गया है। निर्माताओं को इन दवाओं की प्राथमिक पैकेजिंग पर क्यूआर कोड छापना या चिपकाना होगा। यदि प्राथमिक पैक पर पर्याप्त स्थान उपलब्ध नहीं है, तो इसे द्वितीयक पैकेजिंग पर लगाया जा सकेगा। इससे पहले भारत में केवल शीर्ष 300 दवा ब्रांडों के लिए ही क्यूआर-कोड आधारित पहचान अनिवार्य थी। नए संशोधन के बाद इसका दायरा कहीं अधिक व्यापक हो गया है।

अनुपालन की समय-सीमा और महत्व

नए प्रावधानों के अनुसार टीकों, कैंसर-रोधी दवाओं, मादक तथा मनःप्रभावी दवाओं के निर्माताओं को 1 जुलाई 2027 से इन नियमों का पालन करना होगा। वहीं एंटीमाइक्रोबियल दवाओं, जिनमें एंटीबायोटिक भी शामिल हैं, के लिए यह अनिवार्यता 1 जुलाई 2028 से प्रभावी होगी। यह प्रणाली उपभोक्ताओं, फार्मासिस्टों, वितरकों और नियामक संस्थाओं को दवा की वास्तविकता की पुष्टि करने में सहायता करेगी। विशेष रूप से एंटीमाइक्रोबियल दवाओं को इसमें शामिल करना नकली या निम्न गुणवत्ता वाली एंटीबायोटिक दवाओं पर निगरानी मजबूत करने तथा एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस जैसी गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती से निपटने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • ड्रग्स रूल्स, 1945 भारत की दवा नियामक व्यवस्था के अंतर्गत लागू अधीनस्थ विधायी ढांचा है।
  • शेड्यूल H2 उन प्रिस्क्रिप्शन दवाओं से संबंधित है जिनके लिए विशेष लेबलिंग और ट्रेसबिलिटी प्रावधान निर्धारित किए जाते हैं।
  • एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) वह स्थिति है जिसमें सूक्ष्मजीव दवाओं के प्रभाव का प्रतिरोध करने लगते हैं।
  • क्यूआर कोड एक द्वि-आयामी बारकोड है, जो सामान्य एक-आयामी बारकोड की तुलना में अधिक जानकारी सुरक्षित रख सकता है।

दवाओं में क्यूआर-कोड आधारित ट्रेसबिलिटी व्यवस्था का विस्तार भारत की दवा आपूर्ति श्रृंखला को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सुधार है। इससे नकली दवाओं पर अंकुश लगाने, उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़ाने तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण सहायता मिलने की उम्मीद है।

Originally written on June 26, 2026 and last modified on June 26, 2026.

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