त्रिवेंद्रम वेधशाला के पुराने रिकॉर्ड से कैरिंगटन तूफान की नई तस्वीर

त्रिवेंद्रम वेधशाला के पुराने रिकॉर्ड से कैरिंगटन तूफान की नई तस्वीर

केरल की त्रिवेंद्रम खगोलीय वेधशाला से मिले ऐतिहासिक चुंबकीय अभिलेखों ने 1859 के कैरिंगटन इवेंट को लेकर नई जानकारी दी है। यह अध्ययन 19वीं सदी के सबसे तीव्र भू-चुंबकीय तूफानों में गिने जाने वाले इस घटनाक्रम की समयरेखा और तीव्रता को बेहतर ढंग से समझने में मदद करता है।

1859 का कैरिंगटन इवेंट क्यों खास है

कैरिंगटन इवेंट को आधुनिक वैज्ञानिक इतिहास के सबसे शक्तिशाली भू-चुंबकीय तूफानों में माना जाता है। भू-चुंबकीय तूफान तब पैदा होते हैं जब सूर्य से निकली तीव्र गतिविधि, खासकर कोरोनल मास इजेक्शन और सौर प्लाज्मा उत्सर्जन, पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को प्रभावित करते हैं। ऐसे तूफान अंतरिक्ष मौसम का हिस्सा होते हैं और उपग्रहों, संचार प्रणालियों, नेविगेशन और बिजली ढांचे पर असर डाल सकते हैं।

इस नए अध्ययन में 1859 की घटना को एक अकेली चमकदार घटना के बजाय कई दिनों तक चले सौर विस्फोटों और चुंबकीय व्यवधानों की श्रृंखला के रूप में देखा गया है। शोध के अनुसार 14 अगस्त 1859 से 15 सितंबर 1859 के बीच भू-चुंबकीय गतिविधि दर्ज की गई, जबकि सबसे तीव्र चरण 2 सितंबर 1859 को रहा।

त्रिवेंद्रम वेधशाला के रिकॉर्ड से क्या पता चला

यह शोध त्रिवेंद्रम वेधशाला के बिफिलर मैग्नेटोमीटर रिकॉर्ड पर आधारित है। ये रिकॉर्ड 19वीं सदी में पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में होने वाले बदलावों को मापने के लिए तैयार किए गए थे। बाद में ये अभिलेख 160 से अधिक वर्षों तक स्कॉटलैंड में संरक्षित रहे, जहां इन्हें वेधशाला के पूर्व निदेशक जॉन एलन ब्राउन ले गए थे।

अध्ययन का नेतृत्व भौतिकी विभाग के प्रमुख और वेधशाला के मानद मानक निदेशक आर. जयकृष्णन ने किया। शोध में 29 अगस्त 1859 और 2 सितंबर 1859 की घटनाओं को लगभग समान स्तर की भू-चुंबकीय तीव्रता वाला बताया गया है। इनके लिए ΔH मान क्रमशः लगभग −1851 nT और −1926 nT दर्ज किए गए। इससे संकेत मिलता है कि उस अवधि में पृथ्वी पर कई चरणों में प्रभाव पड़ा था।

अंतरिक्ष मौसम और ऐतिहासिक अभिलेखों का महत्व

अंतरिक्ष मौसम पर शोध के लिए ऐतिहासिक चुंबकीय रिकॉर्ड बेहद उपयोगी होते हैं, क्योंकि वे आधुनिक उपग्रह युग से पहले की सौर गतिविधियों का पता लगाने में मदद करते हैं। इस अध्ययन को पुनः सामने लाने में पोलैंड की यागियेलोनियन यूनिवर्सिटी की अन्ना स्ज़ोलुचा की भूमिका भी रही, जिन्होंने अप्रैल 2025 में वेधशाला का दौरा किया था।

यह शोध 20 सितंबर 2026 को Astrophysics and Space Science में प्रकाशित हुआ। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि भारत की पुरानी वेधशालाओं में सुरक्षित वैज्ञानिक अभिलेख आज भी वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण शोध सामग्री हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • कैरिंगटन इवेंट 1859 में हुआ था और इसे अब तक दर्ज सबसे शक्तिशाली भू-चुंबकीय तूफानों में गिना जाता है।
  • बिफिलर मैग्नेटोमीटर पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में बदलाव मापने वाला उपकरण है, जिसका उपयोग 19वीं सदी की वेधशालाओं में होता था।
  • त्रिवेंद्रम खगोलीय वेधशाला भारत की सबसे पुरानी वेधशालाओं में से एक है और इसके ऐतिहासिक रिकॉर्ड वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
  • भू-चुंबकीय तूफान उपग्रहों, रेडियो संचार, नेविगेशन प्रणालियों और बिजली ग्रिड को प्रभावित कर सकते हैं।

इस अध्ययन ने दिखाया है कि पुराने वैज्ञानिक अभिलेख सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि आज के अंतरिक्ष मौसम और सौर गतिविधि को समझने की अहम कुंजी भी हैं।

Originally written on September 21, 2026 and last modified on September 21, 2026.

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