तमिल बहस परंपरा के बड़े चेहरे सोलोमन पप्पैयाह का निधन
तमिल साहित्य, सार्वजनिक वक्तृत्व और टेलीविजन बहसों की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले सोलोमन पप्पैयाह का 11 सितंबर 2026 को मदुरै में 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे तमिल के विद्वान, प्राध्यापक और सांस्कृतिक व्यक्तित्व के रूप में लंबे समय तक सक्रिय रहे। उनकी सबसे बड़ी पहचान पट्टिमंद्रम को लोकप्रिय बनाने वाले वक्ता के रूप में रही, जिसने तमिल समाज में बहस की पारंपरिक शैली को नई पहुंच दी।
मदुरै से शुरू हुआ विद्वत्ता का सफर
22 फरवरी 1936 को सथांगुडी, मदुरै के पास जन्मे सोलोमन पप्पैयाह ने तमिल भाषा और साहित्य को अपना जीवन समर्पित किया। उन्होंने मदुरै के द अमेरिकन कॉलेज में तीन दशकों से अधिक समय तक तमिल पढ़ाया और 1961 से 1994 तक तमिल विभाग का नेतृत्व किया। शिक्षण के साथ-साथ वे साहित्यिक चर्चाओं, सांस्कृतिक आयोजनों और जनसंवाद के मंचों पर भी सक्रिय रहे।
पट्टिमंद्रम को घर-घर तक पहुंचाने में भूमिका
पट्टिमंद्रम तमिल बहस की एक पारंपरिक शैली है, जिसमें वक्ता किसी विषय पर क्रमबद्ध और तर्कपूर्ण ढंग से अपने विचार रखते हैं। सोलोमन पप्पैयाह ने इस परंपरा को टेलीविजन के जरिए आम दर्शकों तक पहुंचाया। उन्होंने रोजमर्रा के सामाजिक मुद्दों को बहस का विषय बनाकर इसे अधिक सहज, रोचक और जनसुलभ बनाया। अपने करियर में उन्होंने 12,000 से अधिक बहस कार्यक्रमों का संचालन किया, जो उनकी लोकप्रियता और प्रभाव का बड़ा संकेत है।
सम्मान, फिल्मी उपस्थिति और सार्वजनिक पहचान
सोलोमन पप्पैयाह को उनके योगदान के लिए कई सम्मान मिले। उन्हें वर्ष 2000 में कलैमामणि पुरस्कार और 2021 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। पद्मश्री भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, जबकि कलैमामणि तमिलनाडु सरकार का कला और साहित्य के क्षेत्र में दिया जाने वाला प्रतिष्ठित राज्य पुरस्कार है। वे तमिल फिल्मों मुधलवन, बॉयज़ और सिवाजी: द बॉस में कैमियो भूमिकाओं में भी नजर आए।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- पट्टिमंद्रम तमिल सार्वजनिक बहस की पारंपरिक शैली है, जिसमें तर्क और साहित्यिक अभिव्यक्ति दोनों का महत्व होता है।
- द अमेरिकन कॉलेज, मदुरै तमिलनाडु के प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थानों में गिना जाता है।
- पद्मश्री भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, क्रमशः भारत रत्न, पद्म विभूषण और पद्म भूषण के बाद।
- कलैमामणि तमिलनाडु सरकार द्वारा कला, साहित्य और संस्कृति में योगदान के लिए दिया जाता है।
सोलोमन पप्पैयाह का जीवन तमिल भाषा, बहस की परंपरा और जनसंचार के बीच एक मजबूत सेतु की तरह रहा। उनके निधन से तमिल सांस्कृतिक जगत ने एक ऐसा व्यक्तित्व खो दिया है, जिसने विद्वत्ता को लोकप्रिय संवाद से जोड़ा।