जम्मू-कश्मीर राज्य के दर्जे की बहाली की मांग पर नेशनल कॉन्फ्रेंस का प्रदर्शन तेज
जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस दिलाने की मांग एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में आ गई है। 20 जुलाई 2026 को नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जम्मू-कश्मीर के जिला मुख्यालयों के साथ-साथ नई दिल्ली में भी प्रदर्शन आयोजित किए। दिल्ली में यह प्रदर्शन जंतर-मंतर पर अनुमति न मिलने के बाद प्रिथ्वीराज रोड से शुरू हुआ। यह विरोध ऐसे समय हुआ जब संसद के मानसून सत्र का पहला दिन था, जिससे इस मांग को और अधिक राजनीतिक महत्व मिल गया।
दिल्ली से जम्मू तक विरोध की एकजुट आवाज
नई दिल्ली में हुए प्रदर्शन का नेतृत्व नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने किया। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी इस प्रदर्शन में शामिल हुए। जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी ने इसे पार्टी की पूर्ण राज्य बहाली की मांग से जोड़ा। पार्टी का कहना है कि यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक और प्रशासनिक अधिकारों से जुड़ा प्रश्न है।जम्मू-कश्मीर में जिला मुख्यालयों पर भी इसी मांग को लेकर प्रदर्शन हुए। इससे साफ है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस इस मुद्दे को केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि इसे प्रदेशव्यापी जन-आंदोलन के रूप में पेश कर रही है।
राज्य से केंद्रशासित प्रदेश तक का संवैधानिक सफर
जम्मू-कश्मीर को 31 अक्टूबर 2019 को पुनर्गठन के बाद केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया था। उस समय पुराने जम्मू-कश्मीर राज्य को दो हिस्सों में बांटा गया—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख। इनमें जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश के पास विधानसभा है, जबकि लद्दाख में विधानसभा नहीं है।यह बदलाव अनुच्छेद 370 से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों और केंद्र के पुनर्गठन फैसले के बाद हुआ। अनुच्छेद 370 पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा देता था। बाद में इस प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2023 में अपना फैसला सुनाया और केंद्र के निर्णय की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। साथ ही अदालत ने यह भी कहा था कि राज्य को यथाशीघ्र बहाल किया जाना चाहिए।
राजनीतिक संदेश और आगे की राह
नेशनल कॉन्फ्रेंस इस मांग को अपने राजनीतिक अभियान का हिस्सा भी बना रही है। पार्टी का तर्क है कि राज्य का दर्जा बहाल होने से जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूती मिलेगी और स्थानीय प्रशासनिक अधिकारों में वृद्धि होगी। वहीं, विरोध प्रदर्शन का संसद सत्र के पहले दिन होना यह संकेत देता है कि पार्टी इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस में बनाए रखना चाहती है।जंतर-मंतर लंबे समय से देश में सार्वजनिक प्रदर्शनों का प्रमुख स्थल रहा है, इसलिए दिल्ली में प्रदर्शन का वहां से शुरू न हो पाना भी चर्चा का विषय बना। कुल मिलाकर, यह आंदोलन जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और राज्य बहाली की बहस को फिर से केंद्र में ले आया है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- 31 अक्टूबर 2019 को जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन कर उसे दो केंद्रशासित प्रदेशों में बदला गया था।
- जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश में विधानसभा है, जबकि लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश में विधानसभा नहीं है।
- अनुच्छेद 370 पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य से संबंधित एक संवैधानिक प्रावधान था।
- सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2023 में अनुच्छेद 370 पर फैसला सुनाया था और राज्य बहाली को जल्द करने की बात कही थी।
इस प्रदर्शन ने एक बार फिर दिखा दिया है कि जम्मू-कश्मीर में राज्य का मुद्दा अभी भी राजनीतिक और संवैधानिक बहस का अहम हिस्सा बना हुआ है। आने वाले समय में संसद, अदालत और राजनीतिक मंचों पर यह विषय लगातार चर्चा में रह सकता है।