चीन ने दक्षिण प्रशांत में पनडुब्बी से बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया
चीन ने 6 जुलाई 2026 को दक्षिण प्रशांत महासागर में अपनी परमाणु-संचालित पनडुब्बी से एक लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया। चीन के सरकारी मीडिया के अनुसार, मिसाइल में डमी (प्रशिक्षण) वारहेड लगाया गया था और इसे स्थानीय समयानुसार दोपहर 12:01 बजे प्रक्षेपित किया गया। बीजिंग ने इसे अपनी वार्षिक सैन्य प्रशिक्षण योजना का नियमित हिस्सा बताया और कहा कि यह किसी विशेष देश या लक्ष्य के विरुद्ध नहीं था। हालांकि, इस परीक्षण को लेकर ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और जापान ने चिंता और आलोचना व्यक्त की। यह परीक्षण ऐसे समय हुआ जब चीन और रूस ने चीन के तट के निकट संयुक्त नौसैनिक अभ्यास ‘जॉइंट सी-2026’ भी शुरू किया।
पनडुब्बी से प्रक्षेपित बैलिस्टिक मिसाइल क्या होती है?
पनडुब्बी से प्रक्षेपित बैलिस्टिक मिसाइल (एसएलबीएम) ऐसी बैलिस्टिक मिसाइल होती है जिसे समुद्र के भीतर संचालित पनडुब्बी से दागा जाता है। यह किसी भी देश की समुद्री आधारित परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। परमाणु-संचालित पनडुब्बियां लंबे समय तक समुद्र में रह सकती हैं, जिससे उनकी पहचान करना कठिन होता है और वे रणनीतिक सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
दक्षिण प्रशांत परमाणु-मुक्त क्षेत्र और बढ़ती रणनीतिक चिंता
दक्षिण प्रशांत परमाणु-मुक्त क्षेत्र की स्थापना 1985 में रारोटोंगा संधि के तहत की गई थी। इस क्षेत्र का उद्देश्य परमाणु विस्फोटक उपकरणों की तैनाती, परीक्षण और अधिग्रहण पर प्रतिबंध लगाकर क्षेत्रीय सुरक्षा को बढ़ावा देना है। चीन का यह परीक्षण इसी क्षेत्र में होने के कारण कई देशों ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चिंताजनक बताया। जापान ने परीक्षण से पहले चीन से पुनर्विचार करने का अनुरोध किया था, जबकि न्यूज़ीलैंड को प्रक्षेपण से कुछ घंटे पहले ही सूचना दी गई। ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और जापान ने परीक्षण को पारदर्शिता और क्षेत्रीय विश्वास के दृष्टिकोण से चिंताजनक बताया। दूसरी ओर, चीन का कहना है कि यह परीक्षण अंतरराष्ट्रीय कानून और प्रचलित मानकों के अनुरूप किया गया।
चीन के रणनीतिक सैन्य परीक्षणों का महत्व
यह सितंबर 2024 के बाद प्रशांत क्षेत्र में चीन का दूसरा रणनीतिक मिसाइल परीक्षण है। 2024 में चीन ने एक अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) का परीक्षण किया था। इसके अलावा, 1982 के बाद पहली बार किसी परमाणु-संचालित पनडुब्बी से इस प्रकार के रणनीतिक मिसाइल परीक्षण की सार्वजनिक जानकारी सामने आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के परीक्षण चीन की समुद्री परमाणु क्षमता और रणनीतिक प्रतिरोधक शक्ति को प्रदर्शित करते हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- रारोटोंगा संधि के तहत 1985 में दक्षिण प्रशांत परमाणु-मुक्त क्षेत्र की स्थापना की गई थी।
- अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) की मारक क्षमता सामान्यतः 5,500 किलोमीटर से अधिक होती है।
- परमाणु-संचालित पनडुब्बी में ऊर्जा और प्रणोदन के लिए परमाणु रिएक्टर का उपयोग किया जाता है।
- ‘जॉइंट सी-2026’ चीन और रूस के बीच आयोजित वार्षिक संयुक्त नौसैनिक अभ्यास है, जिसका आयोजन चीन के क़िंगदाओ तट के निकट किया जा रहा है।
चीन का यह मिसाइल परीक्षण इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती सामरिक प्रतिस्पर्धा और समुद्री सुरक्षा को लेकर नई बहस को जन्म देता है। जहां चीन इसे नियमित सैन्य अभ्यास बता रहा है, वहीं क्षेत्र के कई देश इसे पारदर्शिता, विश्वास और क्षेत्रीय स्थिरता के संदर्भ में गंभीरता से देख रहे हैं। आने वाले समय में इस तरह की गतिविधियां इंडो-पैसिफिक की सामरिक राजनीति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती हैं।