गोल्डन लंगूरों की सफल पुनर्वापसी से वन्यजीव संरक्षण को मिली नई मजबूती
असम में वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की गई है। 25 जून 2026 को बचाव, पुनर्वास और वैज्ञानिक मूल्यांकन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद सात संकटग्रस्त गोल्डन लंगूरों को असम के सिखना ज्व्हवलाओ राष्ट्रीय उद्यान में सुरक्षित रूप से छोड़ दिया गया। इन दुर्लभ प्राइमेट्स को 19 जून 2026 को चिरांग जिले में वन्यजीव तस्करों के कब्जे से बचाया गया था। इस कार्रवाई के दौरान असम पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने नौ संदिग्ध तस्करों को गिरफ्तार किया, जिनमें एक बांग्लादेशी नागरिक भी शामिल था। यह अभियान भारत में वन्यजीव तस्करी के खिलाफ चल रहे प्रयासों की एक बड़ी सफलता माना जा रहा है।
गोल्डन लंगूर का महत्व और संरक्षण
गोल्डन लंगूर का वैज्ञानिक नाम ट्रैकिपिथेकस गीई (Trachypithecus geei) है। यह दुनिया के सबसे संकटग्रस्त प्राइमेट्स में गिना जाता है और भारत में इसका प्राकृतिक विस्तार केवल पश्चिमी असम तथा भूटान के दक्षिणी पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित है। यह प्रजाति मुख्य रूप से घने वन क्षेत्रों में निवास करती है और बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र के जंगल इसके प्रमुख आवास हैं। भारत के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I में शामिल होने के कारण गोल्डन लंगूर को देश में सर्वोच्च कानूनी संरक्षण प्राप्त है। इस श्रेणी में शामिल जीवों के शिकार, व्यापार या अवैध परिवहन पर कड़ी कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है।
सिखना ज्व्हवलाओ राष्ट्रीय उद्यान की विशेषताएँ
सिखना ज्व्हवलाओ राष्ट्रीय उद्यान असम का सबसे नया राष्ट्रीय उद्यान है। लगभग 316 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला यह उद्यान चिरांग और कोकराझार जिलों में स्थित है। यह मानस बायोस्फीयर रिजर्व का हिस्सा है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जैव विविधता संरक्षण के लिए विशेष महत्व प्राप्त है। यह राष्ट्रीय उद्यान अनेक दुर्लभ वन्यजीवों के लिए सुरक्षित आवास उपलब्ध कराता है। राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना का उद्देश्य प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखना और संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण को मजबूत बनाना है।
बचाव, पुनर्वास और वन्यजीव संरक्षण की प्रक्रिया
गोल्डन लंगूरों को तस्करों से छुड़ाने के बाद वन विभाग ने उनका चिकित्सकीय परीक्षण, देखभाल और वैज्ञानिक निगरानी की। विशेषज्ञों द्वारा यह सुनिश्चित किया गया कि वे दोबारा प्राकृतिक वातावरण में रहने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं। इसके बाद सात लंगूरों को उनके उपयुक्त प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया गया। इस अभियान के दौरान कुल आठ गोल्डन लंगूर बरामद हुए थे, लेकिन एक की उपचार और पुनर्वास के बावजूद मृत्यु हो गई। वन्यजीव बचाव अभियानों में ऐसी घटनाएँ कभी-कभी सामने आती हैं, क्योंकि तस्करी के दौरान जानवरों को गंभीर शारीरिक और मानसिक क्षति पहुँचती है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- गोल्डन लंगूर का वैज्ञानिक नाम ट्रैकिपिथेकस गीई (Trachypithecus geei) है।
- यह प्रजाति मुख्य रूप से पश्चिमी असम और दक्षिणी भूटान तक सीमित पाई जाती है।
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I में शामिल प्रजातियों को भारत में सर्वोच्च कानूनी सुरक्षा प्राप्त होती है।
- सिखना ज्व्हवलाओ राष्ट्रीय उद्यान असम का नवीनतम राष्ट्रीय उद्यान है और यह मानस बायोस्फीयर रिजर्व का हिस्सा है।
गोल्डन लंगूरों की सफल रिहाई यह दर्शाती है कि प्रभावी कानून प्रवर्तन, वैज्ञानिक पुनर्वास और संरक्षित वन क्षेत्रों का समन्वय संकटग्रस्त वन्यजीवों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे अभियान न केवल अवैध वन्यजीव तस्करी पर रोक लगाने में सहायक हैं, बल्कि जैव विविधता को सुरक्षित रखने और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम साबित होते हैं।