कभी भारत पर राज करने वाली सरकारी टेलीकॉम कंपनियां MTNL और BSNL रेस से बाहर कैसे हो गईं?
एक दौर था जब भारत में लैंडलाइन फोन का मतलब सिर्फ बीएसएनएल (BSNL) हुआ करता था। दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में एमटीएनएल (MTNL) का सिक्का चलता था। नया कनेक्शन लेने के लिए लोगों को सालों इंतजार करना पड़ता था और सरकारी बाबू से पैरवी लगवानी पड़ती थी। लेकिन आज स्थिति बिल्कुल उलट है। निजी कंपनियों (Private Operators) के आने और तकनीक के बदलने के बाद ये दोनों सरकारी कंपनियां आज वेंटिलेटर पर दिखाई देती हैं। हर साल हजारों करोड़ रुपये का घाटा उठाने वाली इन कंपनियों के इस हाल के पीछे सिर्फ किस्मत का दोष नहीं है, बल्कि इसके पीछे गलत बिजनेस फैसले, सरकारी लालफीताशाही और मार्केटिंग की रणनीतियों में भारी चूक जिम्मेदार है।
निजी कंपनियों की एंट्री और एकाधिकार का अंत
साल 1999 से पहले तक भारत में टेलीकॉम सेक्टर पर पूरी तरह सरकार का नियंत्रण था। लेकिन जब सरकार ने न्यू टेलीकॉम पॉलिसी (NTP 1999) लागू की, तो निजी कंपनियों के लिए रास्ते खुल गए। एयरटेल, हच (जो बाद में वोडाफोन बना) और टाटा जैसी कंपनियों ने बाजार में कदम रखा। शुरुआती दौर में भी BSNL के पास देश का सबसे बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर (Optical Fiber Network) था। लेकिन निजी कंपनियों ने सरकारी कंपनियों की सबसे बड़ी कमजोरी को भांप लिया—वह कमजोरी थी ‘कस्टमर सर्विस’। सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने से परेशान उपभोक्ता तेजी से निजी कंपनियों की तरफ शिफ्ट होने लगे, जो घर आकर सिम कार्ड और कनेक्शन दे रही थीं।

तकनीक के बदलाव को अपनाने में भारी देरी
टेलीकॉम एक ऐसा बिजनेस है जहां तकनीक बहुत तेजी से बदलती है। जो कंपनी समय के साथ अपग्रेड नहीं होती, वह खत्म हो जाती है। BSNL और MTNL के डूबने की सबसे बड़ी वजह यही रही। जब निजी कंपनियां 2G से 3G और फिर 4G की तरफ तेजी से बढ़ रही थीं, तब सरकारी कंपनियां टेंडर पास कराने और सरकारी मंजूरियों के जाल में उलझी हुई थीं। साल 2016 में जब रिलायंस जियो (Jio) ने कदम रखा और पूरे देश में मुफ्त 4G इंटरनेट देकर बाजार की परिभाषा बदल दी, उस समय भी BSNL के पास अपना पूर्ण 4G नेटवर्क नहीं था। उपभोक्ता 4G की स्पीड चाहते थे, जबकि सरकारी कंपनियां उन्हें 3G के भरोसे रोके रखना चाहती थीं।

टेंडर प्रक्रिया और सरकारी लालफीताशाही का जाल
निजी कंपनियां किसी भी नई तकनीक को खरीदने या नेटवर्क बढ़ाने के लिए कुछ दिनों में फैसला ले लेती हैं। इसके उलट, BSNL और MTNL को कोई भी नया उपकरण (Equipment) खरीदने के लिए एक लंबी और जटिल टेंडर प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। कई बार टेंडर में धांधली के आरोप लगते, तो कई बार राजनीतिक कारणों से फाइलें महीनों तक दबी रहती थीं। इसका नतीजा यह हुआ कि कंपनियां समय पर अपने नेटवर्क को अपग्रेड नहीं कर पाईं। जब तक टेंडर पास होता और उपकरण आते, तब तक वह तकनीक पुरानी (Obsolete) हो चुकी होती थी।
कर्मचारियों का भारी खर्च और रेवेन्यू का असंतुलन
BSNL और MTNL की वित्तीय स्थिति बिगड़ने के पीछे एक बड़ा कारण उनकी कमाई और खर्च का असंतुलन भी था। सरकारी कंपनी होने के नाते इनके पास कर्मचारियों की एक बहुत बड़ी फौज थी। एक समय ऐसा था जब BSNL की कुल कमाई का लगभग 50 से 60 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ कर्मचारियों की सैलरी और पेंशन देने में चला जाता था। इसके विपरीत, निजी कंपनियां आउटसोर्सिंग (Outsourcing) के जरिए बहुत कम कर्मचारियों के साथ अपना काम चलाती हैं और उनका यह खर्च मात्र 5 से 10 प्रतिशत होता है। जब कमाई का बड़ा हिस्सा सिर्फ सैलरी में जाएगा, तो नेटवर्क सुधारने और नई तकनीक लाने के लिए पैसा कहां से बचेगा?
एमटीएनएल और बीएसएनएल के पतन से जुड़े कुछ कड़वे सच
इस टेलीकॉम युद्ध में इन सरकारी कंपनियों की हार के कुछ मुख्य पहलुओं को इस तरह समझा जा सकता है:
- मार्केटिंग में विफलता: निजी कंपनियों ने युवाओं को टारगेट करके आकर्षक विज्ञापन बनाए, जबकि सरकारी कंपनियां अपनी पारंपरिक छवि से बाहर नहीं आ पाईं।
- शहरी बाजार से बेदखली: MTNL जो कभी दिल्ली और मुंबई जैसे सबसे अमीर टेलीकॉम सर्किल पर राज करती थी, आज वहां अपनी पहचान खो चुकी है।
- फंड की कमी: घाटा बढ़ने के कारण बैंकों ने भी इन्हें लोन देना बंद कर दिया, जिससे दैनिक कामकाज चलाना भी मुश्किल हो गया।
क्या अब कभी वापसी कर पाएंगी ये सरकारी कंपनियां?
सरकार ने पिछले कुछ सालों में BSNL और MTNL को पुनर्जीवित करने के लिए कई राहत पैकेजों (Revival Packages) की घोषणा की है। कर्मचारियों के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (VRS) लाई गई ताकि सैलरी का बोझ कम किया जा सके। अब स्वदेशी 4G और 5G नेटवर्क तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। लेकिन टेलीकॉम बाजार अब पूरी तरह बदल चुका है। अब यह खेल सिर्फ नेटवर्क का नहीं, बल्कि डिजिटल इकोसिस्टम, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और हाई-स्पीड फाइबर ब्रॉडबैंड का है। ऐसे में इन सरकारी कंपनियों के लिए निजी दिग्गजों को टक्कर देना बेहद चुनौतीपूर्ण है।