अंतरिक्ष में गुम हुआ भारत का पहला ‘ऑप्टोसैट’ सैटेलाइट: सौर तूफान ने कैसे बिगाड़ा गैलेक्सी का खेल?

अंतरिक्ष में गुम हुआ भारत का पहला ‘ऑप्टोसैट’ सैटेलाइट: सौर तूफान ने कैसे बिगाड़ा गैलेक्सी का खेल?

ब्रह्मांड की गहराइयों से उठने वाले सौर तूफान यानी जियोमैग्नेटिक सोलर स्टॉर्म कितने खतरनाक हो सकते हैं, इसका ताजा उदाहरण अंतरिक्ष में देखने को मिला है। भारत के एक महत्वाकांक्षी स्पेस-टेक स्टार्टअप ‘गैलेक्सी’ (GalaxEye) का पहला सैटेलाइट ‘मिशन दृष्टि’ अंतरिक्ष में एक बड़े हादसे का शिकार हो गया है। सौर तूफान से निकली खतरनाक रेडिएशन के कारण इस सैटेलाइट का संपर्क बेंगलुरु स्थित कंट्रोल सेंटर से टूट गया है। यह घटना भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर के लिए एक बड़ा सबक और चुनौती बनकर सामने आई है। मिशन दृष्टि कोई आम सैटेलाइट नहीं था। यह भारत का सबसे बड़ा निजी तौर पर निर्मित अर्थ ऑब्जर्वेशन (पृथ्वी अवलोकन) सैटेलाइट था। इसके साथ ही यह दुनिया का पहला ‘ऑप्टोसैट’ (OptoSAR) सैटेलाइट भी था, जिसे मौसम की हर मार को झेलते हुए दिन-रात साफ तस्वीरें लेने के लिए डिजाइन किया गया था। लेकिन अंतरिक्ष के बेरहम मौसम ने इस ऐतिहासिक मिशन के सामने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।

क्या था मिशन दृष्टि और क्यों यह दुनिया में सबसे अलग था?

स्पेस टेक्नोलॉजी की दुनिया में अब तक दो तरह के कैमरे मुख्य रूप से इस्तेमाल किए जाते हैं। पहला होता है ऑप्टिकल कैमरा, जो आम कैमरों की तरह काम करता है और रात के अंधेरे या घने बादलों में तस्वीरें नहीं ले पाता। दूसरा होता है सार (SAR – Synthetic Aperture Radar), जो बादलों और अंधेरे को चीरकर तस्वीरें ले सकता है, लेकिन इसमें रंगों और बारीकियों की कमी होती है। बेंगलुरु के स्टार्टअप गैलेक्सी ने इन दोनों टेक्नोलॉजी को मिलाकर ‘ऑप्टोसैट’ नाम की एक अनूठी तकनीक विकसित की। मिशन दृष्टि इसी तकनीक पर आधारित दुनिया का पहला सैटेलाइट था।

  • मल्टीस्पेक्ट्रल इमेजिंग और सार का संगम: यह सैटेलाइट एक ही समय में एक ही जगह की हाई-रिज़ॉल्यूशन ऑप्टिकल और राडार तस्वीरें ले सकता था।
  • हर मौसम में काम करने की क्षमता: चाहे आसमान में घने बादल छाए हों, भारी बारिश हो रही हो या फिर आधी रात का वक्त हो, दृष्टि को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था।
  • निजी क्षेत्र का गौरव: यह भारत के किसी प्राइवेट स्टार्टअप द्वारा बनाया गया अब तक का सबसे विशाल और उन्नत अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट था।
क्या था मिशन दृष्टि और क्यों यह दुनिया में सबसे अलग था?

कैलिफोर्निया से बेंगलुरु तक का सफर और वो आखिरी मोड़

मिशन दृष्टि की शुरुआत बेहद शानदार रही थी। 3 मई 2026 को अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित वैंडेनबर्ग स्पेस फोर्स बेस से एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स (SpaceX) के रॉकेट के जरिए इसे अंतरिक्ष में भेजा गया था। लॉन्चिंग पूरी तरह सफल रही और सैटेलाइट ने अंतरिक्ष में अपनी तय कक्षा (ऑर्बिट) हासिल कर ली। लॉन्च के बाद का समय किसी भी सैटेलाइट के लिए सबसे संवेदनशील होता है, जिसे ‘लॉन्च एंड अर्ली ऑर्बिट फेज’ (LEOP) कहा जाता है। इस दौरान बेंगलुरु में बैठे गैलेक्सी के इंजीनियर सैटेलाइट के सभी सिस्टम को धीरे-धीरे चालू कर रहे थे और उनकी जांच कर रहे थे। सैटेलाइट ने अपने इस शुरुआती चरण का एक बड़ा हिस्सा सफलतापूर्वक पूरा भी कर लिया था। कंपनी के इन-हाउस मिशन ऑपरेशंस की क्षमताओं की पुष्टि हो चुकी थी और सब कुछ योजना के मुताबिक चल रहा था। तभी अंतरिक्ष में एक भयानक सौर तूफान उठा। सूर्य से निकली अत्यधिक ऊर्जावान कणों और रेडिएशन की लहर ने दृष्टि सैटेलाइट को अपनी चपेट में ले लिया। शुरुआती जांच से पता चला है कि इस सौर तूफान के रेडिएशन के कारण सैटेलाइट के एक बेहद महत्वपूर्ण ऑनबोर्ड सिस्टम पर गहरा असर पड़ा। इसके चलते पहले तो सिग्नल में रुकावटें आने लगीं और आखिरकार सैटेलाइट से पूरी तरह संपर्क टूट गया।

कैलिफोर्निया से बेंगलुरु तक का सफर और वो आखिरी मोड़

सौर तूफान कैसे बनते हैं सैटेलाइट्स के दुश्मन?

सूरज की सतह पर होने वाले विशाल विस्फोटों से जो चुंबकीय ऊर्जा और चार्ज्ड पार्टिकल्स निकलते हैं, उन्हें सौर तूफान कहा जाता है। जब ये पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से टकराते हैं, तो जियोमैग्नेटिक स्टॉर्म पैदा होता है। अंतरिक्ष में तैर रहे सैटेलाइट्स के लिए ये तूफान किसी अदृश्य काल की तरह होते हैं। सौर तूफान के दौरान निकलने वाली तेज रेडिएशन सैटेलाइट के संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक सर्किट्स को झुलसा सकती है। इसके अलावा, ये पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल को गर्म करके फैला देते हैं, जिससे हवा का घर्षण (ड्रैग) बढ़ जाता है और सैटेलाइट अपनी तय कक्षा से नीचे गिर सकते हैं। मिशन दृष्टि के मामले में भी रेडिएशन ने उसके कम्युनिकेशन सिस्टम या मुख्य कंप्यूटर को नुकसान पहुंचाया, जिससे वह बेंगलुरु कंट्रोल सेंटर की आवाज सुनने में असमर्थ हो गया। हालांकि गैलेक्सी की टीम अभी भी सैटेलाइट से दोबारा संपर्क साधने की कोशिशों में जुटी है, लेकिन कंपनी ने साफ तौर पर माना है कि अंतरिक्ष की परिस्थितियों को देखते हुए इस सैटेलाइट के वापस ठीक होने की उम्मीद बेहद कम है।

नुकसान के बीच छिपी कामयाबी और भविष्य का रोडमैप

भले ही मिशन दृष्टि से संपर्क टूट गया हो, लेकिन इस मिशन को पूरी तरह असफल नहीं कहा जा सकता। एक गहरे झटके के बावजूद, इस स्टार्टअप ने वैश्विक स्तर पर भारत का नाम रोशन किया है। इस पूरे घटनाक्रम से कंपनी को कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां और सीख मिली हैं।

  • टेक्नोलॉजी का वेरिफिकेशन: सैटेलाइट ने अंतरिक्ष में जाने के बाद अपने कई महत्वपूर्ण तकनीकी परीक्षणों को सफलतापूर्वक पास किया, जिससे गैलेक्सी की ऑप्टोसैट तकनीक की विश्वसनीयता साबित हुई।
  • कंट्रोल सेंटर की मजबूती: बेंगलुरु में बने मिशन कंट्रोल सेंटर ने पहली बार किसी जटिल सैटेलाइट को अंतरिक्ष में पूरी तरह ऑपरेट करके अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया।
  • भविष्य के लिए कवच: इस हादसे से मिले डेटा का इस्तेमाल कंपनी अपने अगले सैटेलाइट्स को और अधिक मजबूत बनाने के लिए करेगी, ताकि वे भविष्य में आने वाले सौर तूफानों को झेल सकें।

गैलेक्सी ने हार न मानते हुए भविष्य की तैयारी शुरू कर दी है। कंपनी इस मिशन से मिले कड़वे अनुभवों और सबक को अपने अगले स्पेसक्राफ्ट आर्किटेक्चर में शामिल करने जा रही है। कंपनी का लक्ष्य अगले 24 महीनों के भीतर अंतरिक्ष में दो नए और अधिक सुरक्षित ऑप्टोसैट सैटेलाइट लॉन्च करने का है।

स्पेस रेस और सौर तूफानों का अनोखा इतिहास

अंतरिक्ष में सौर तूफानों के कारण सैटेलाइट्स का खराब होना कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी दुनिया की बड़ी-बड़ी स्पेस एजेंसियां और कंपनियां इसका शिकार बन चुकी हैं। साल 2022 में एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स के करीब 40 स्टारलिंक सैटेलाइट एक सौर तूफान की वजह से अपनी कक्षा से भटक कर नष्ट हो गए थे। सूर्य हर 11 साल में अपने एक सक्रिय चक्र (सोलर मैक्सिमम) से गुजरता है, जिस दौरान ऐसे तूफानों की संख्या और तीव्रता काफी बढ़ जाती है। भारतीय स्टार्टअप गैलेक्सी का यह मिशन भी इसी चुनौतीपूर्ण समय के दौरान अंतरिक्ष में भेजा गया था, जिसने साबित किया है कि निजी कंपनियों के लिए अंतरिक्ष की राह जितनी रोमांचक है, उतनी ही जोखिम भरी भी है।

Originally written on July 7, 2026 and last modified on July 7, 2026.

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