ऑटो कंपोनेंट व्यापार में बढ़ा आयात दबाव, भारत के सामने नई तकनीकी चुनौती
भारत के ऑटो-कंपोनेंट व्यापार संतुलन में बड़ा बदलाव आया है। वित्त वर्ष 2025-26 में यह 1.4 अरब डॉलर के घाटे में पहुंच गया, जबकि निर्यात करीब 24 अरब डॉलर और आयात 25.4 अरब डॉलर रहा। नई दिल्ली में 2 सितंबर 2026 को एसीएमए के 66वें वार्षिक सत्र में इस गिरते संतुलन पर विस्तार से चर्चा हुई। यह संकेत है कि भारतीय ऑटो उद्योग अब केवल उत्पादन विस्तार नहीं, बल्कि तकनीक, डिजाइन और उच्च मूल्य वाले घटकों में आत्मनिर्भरता की चुनौती से भी जूझ रहा है।
क्यों बढ़ा व्यापार घाटा
ऑटो-कंपोनेंट क्षेत्र में भारत का निर्यात अभी भी मुख्यतः परिपक्व तकनीकों पर आधारित है। इनमें वे पुर्जे और असेंबली शामिल हैं जो पारंपरिक वाहन निर्माण में लंबे समय से इस्तेमाल हो रहे हैं। दूसरी ओर, आयात का बड़ा हिस्सा सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी सेल और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे उन्नत और महंगे घटकों का है। यही असंतुलन व्यापार घाटे को बढ़ा रहा है।
ऑटो कंपोनेंट केवल कारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यात्री वाहनों, वाणिज्यिक वाहनों, दोपहिया वाहनों और इलेक्ट्रिक वाहनों में इस्तेमाल होने वाले इंजन, ट्रांसमिशन, ब्रेकिंग सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी और सॉफ्टवेयर-आधारित मॉड्यूल भी इसमें आते हैं।
तकनीक और डिजाइन पर जोर
ह्युंडई मोटर इंडिया के एमडी और सीईओ तरुण गर्ग ने उद्योग को “मेक इन इंडिया” से आगे बढ़कर “डिजाइन, इंजीनियर और क्रिएट इन इंडिया” की दिशा में काम करने की जरूरत बताई। इसका अर्थ है कि भारत केवल निर्माण केंद्र न रहे, बल्कि उत्पाद डिजाइन, इंजीनियरिंग और अनुसंधान एवं विकास में भी मजबूत भूमिका निभाए।
केंद्रीय भारी उद्योग और इस्पात मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी ने उद्योग से स्वच्छ, कुशल और उभरती तकनीकों में निवेश करने को कहा। वहीं वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने हाल के व्यापार समझौतों से बने बाजार अवसरों का उपयोग कर वैश्विक उत्पादन नेटवर्क में भारत की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया।
पीएलआई योजना और उद्योग का भविष्य
ऑटोमोबाइल और ऑटो कंपोनेंट्स के लिए उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन यानी पीएलआई योजना ने 30 जून 2026 तक 45,477 करोड़ रुपये के स्वीकृत निवेश और 67,000 से अधिक नौकरियों का सृजन किया है। यह योजना चयनित क्षेत्रों में अतिरिक्त उत्पादन और निवेश को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार का एक प्रमुख औद्योगिक उपकरण है।
बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप और एसीएमए की संयुक्त रिपोर्ट ने अनुमान लगाया है कि उद्योग का टर्नओवर वित्त वर्ष 2030 तक 200 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। हालांकि, श्रम की कमी और कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जैसी चुनौतियां भी बनी हुई हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- एसीएमए भारत में ऑटो-कंपोनेंट निर्माताओं का शीर्ष उद्योग संगठन है।
- इलेक्ट्रिक वाहनों में बैटरी सेल, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और नियंत्रण प्रणालियों की आयात निर्भरता पारंपरिक वाहनों की तुलना में अधिक होती है।
- सॉफ्टवेयर-डिफाइंड वाहन वे होते हैं जिनमें इंफोटेनमेंट, कनेक्टिविटी और ड्राइविंग फीचर्स जैसे कई कार्य सॉफ्टवेयर से नियंत्रित होते हैं।
- पीएलआई योजना भारत में उत्पादन और निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए चुने हुए क्षेत्रों में लागू की जाती है।
कुल मिलाकर, ऑटो-कंपोनेंट व्यापार घाटा यह दिखाता है कि भारत के लिए अगला चरण केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि उन्नत तकनीकों, डिजाइन क्षमता और उच्च मूल्य वाले पुर्जों में घरेलू पकड़ मजबूत करना है।