एसीएमई और मित्सुबिशी के बीच ग्रीन मेथेनॉल की एक अरब डॉलर की ऐतिहासिक डील

एसीएमई और मित्सुबिशी के बीच ग्रीन मेथेनॉल की एक अरब डॉलर की ऐतिहासिक डील

भारत स्वच्छ ऊर्जा और कम-कार्बन ईंधन के क्षेत्र में लगातार अपनी उपस्थिति मजबूत कर रहा है। इसी दिशा में एसीएमई ग्रुप की इकाई एसीएमई ग्रीन मॉलिक्यूल्स बिजनेस ने 3 जुलाई 2026 को जापान की मित्सुबिशी गैस केमिकल कंपनी के साथ दीर्घकालिक खरीद एवं बिक्री समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते के तहत प्रतिवर्ष 1 लाख टन ग्रीन मेथेनॉल की आपूर्ति की जाएगी, जिसकी अनुमानित कुल कीमत लगभग 1 अरब अमेरिकी डॉलर है। यह समझौता भारत को वैश्विक कम-कार्बन समुद्री ईंधन बाजार में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

ग्रीन मेथेनॉल क्या है और इसका महत्व

ग्रीन मेथेनॉल एक कम-कार्बन ईंधन है, जिसका उत्पादन नवीकरणीय स्रोतों से किया जाता है। पारंपरिक मेथेनॉल की तुलना में इसकी उत्पादन प्रक्रिया इस प्रकार विकसित की जाती है कि पूरे जीवनचक्र में कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन काफी कम हो। यही कारण है कि इसे औद्योगिक उपयोगों के साथ-साथ समुद्री परिवहन क्षेत्र में भविष्य के स्वच्छ ईंधन के रूप में देखा जा रहा है। बढ़ते पर्यावरणीय मानकों और कार्बन उत्सर्जन में कमी की वैश्विक प्रतिबद्धताओं के कारण इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है।

यूरोपीय मानकों के अनुरूप होगा उत्पादन

इस समझौते के तहत आपूर्ति किया जाने वाला ग्रीन मेथेनॉल यूरोपीय संघ के आरएफएनबीओ (रिन्यूएबल फ्यूल्स ऑफ नॉन-बायोलॉजिकल ओरिजिन) मानकों के अनुरूप तैयार किया जाएगा। इसके साथ ही यह भविष्य में अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन द्वारा लागू किए जाने वाले कार्बन तीव्रता संबंधी नियमों का भी पालन करेगा। इससे अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों को पर्यावरण-अनुकूल ईंधन उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी और वैश्विक समुद्री परिवहन क्षेत्र के हरित परिवर्तन को गति मिलेगी।

ओडिशा के पारादीप में होगा उत्पादन

ग्रीन मेथेनॉल का उत्पादन एसीएमई की ओडिशा के पारादीप स्थित परियोजना में किया जाएगा। पारादीप भारत के पूर्वी तट पर स्थित एक प्रमुख औद्योगिक एवं बंदरगाह क्षेत्र है। यह परियोजना ओडिशा में एसीएमई समूह का तीसरा बड़ा निवेश है, जो राज्य में औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन को भी बढ़ावा देगा। साथ ही, यह भारत की हरित ऊर्जा उत्पादन क्षमता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

भारत के लिए क्यों है यह समझौता महत्वपूर्ण

यह समझौता भारत और जापान के बीच स्वच्छ ऊर्जा सहयोग को नई दिशा देता है। इसके माध्यम से भारत वैश्विक कम-कार्बन समुद्री ईंधन बाजार में एक विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता के रूप में उभर रहा है। साथ ही, भारतीय कंपनियों की तकनीकी क्षमता और हरित ईंधन उत्पादन में बढ़ती भागीदारी को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल रही है। भविष्य में ऐसे समझौते भारत की ऊर्जा सुरक्षा, निर्यात क्षमता और सतत विकास लक्ष्यों को मजबूत बनाने में सहायक होंगे।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • मेथेनॉल का रासायनिक सूत्र CH₃OH है और इसे मिथाइल अल्कोहल भी कहा जाता है।
  • ग्रीन मेथेनॉल का उपयोग समुद्री ईंधन के रूप में अपेक्षाकृत कम बदलावों के साथ मौजूदा जहाजों और बंदरगाह अवसंरचना में किया जा सकता है।
  • अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन संयुक्त राष्ट्र की विशेष एजेंसी है, जो समुद्री सुरक्षा और समुद्री प्रदूषण नियंत्रण से संबंधित वैश्विक नियम बनाती है।
  • ओडिशा बंगाल की खाड़ी के किनारे स्थित भारत का प्रमुख तटीय राज्य है, जहां कई बड़े औद्योगिक और बंदरगाह आधारित परियोजनाएं संचालित होती हैं।

भारत का हरित ऊर्जा क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहा है और ग्रीन मेथेनॉल जैसे स्वच्छ ईंधनों का उत्पादन देश को वैश्विक ऊर्जा परिवर्तन में अग्रणी भूमिका दिला सकता है। एसीएमई और मित्सुबिशी के बीच हुआ यह समझौता न केवल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छ समुद्री परिवहन और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा सहयोग की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

Originally written on July 3, 2026 and last modified on July 3, 2026.

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