एनीमिया नियंत्रण के लिए आईसीएमआर और गेट्स फाउंडेशन ने शुरू की ₹1 करोड़ ग्रैंड चैलेंज पहल
भारत में एनीमिया की गंभीर समस्या से निपटने के लिए भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और गेट्स फाउंडेशन ने 13 जून 2026 को नई दिल्ली में ₹1 करोड़ की ‘ग्रैंड चैलेंज’ पहल शुरू की है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य आयरन से भरपूर खाद्य उत्पादों का विकास करना है, जो विशेष रूप से किशोरियों और प्रजनन आयु की महिलाओं में एनीमिया की समस्या को कम करने में सहायक हों। यह पहल पारंपरिक आयरन सप्लीमेंट्स के अतिरिक्त खाद्य-आधारित समाधान विकसित करने पर केंद्रित है।
एनीमिया क्या है?
एनीमिया एक ऐसी चिकित्सीय स्थिति है जिसमें रक्त में हीमोग्लोबिन या लाल रक्त कोशिकाओं की मात्रा सामान्य स्तर से कम हो जाती है। हीमोग्लोबिन शरीर के विभिन्न अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचाने का कार्य करता है, इसलिए इसकी कमी से कमजोरी, थकान, चक्कर आना और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। भारत में एनीमिया एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। अनुमान के अनुसार देश में लगभग हर दूसरी किशोरी और प्रजनन आयु की महिला एनीमिया से प्रभावित है। यह स्थिति महिलाओं के स्वास्थ्य, कार्यक्षमता और मातृ स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
ग्रैंड चैलेंज का उद्देश्य
इस पहल का मुख्य उद्देश्य ऐसे किफायती और पोषक खाद्य उत्पाद विकसित करना है जो आयरन की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध कराएं और लोगों द्वारा आसानी से स्वीकार किए जा सकें। आईसीएमआर और गेट्स फाउंडेशन चाहते हैं कि शोधकर्ता, स्टार्टअप, खाद्य उद्योग और गैर-लाभकारी संस्थाएं मिलकर ऐसे अभिनव उत्पाद विकसित करें जो स्थानीय स्वाद, खाद्य आदतों और क्षेत्रीय सामग्री के अनुरूप हों।
वित्तीय सहायता और आवेदन प्रक्रिया
इस कार्यक्रम के तहत चयनित परियोजनाओं को प्रोटोटाइप विकसित करने के लिए अधिकतम ₹1 करोड़ तक की वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। उत्पाद विकास के लिए एक वर्ष की अवधि निर्धारित की गई है। इस चुनौती में शोध संस्थान, स्टार्टअप, खाद्य कंपनियां और गैर-सरकारी संगठन भाग ले सकते हैं। आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि 3 जुलाई 2026 निर्धारित की गई है।
प्रस्तावित खाद्य उत्पादों की विशेषताएं
चुनौती के तहत विकसित किए जाने वाले खाद्य उत्पादों से अपेक्षा की गई है कि वे प्रति सर्विंग 4 से 5 मिलीग्राम आयरन उपलब्ध कराएं। उत्पादों को किफायती, स्वादिष्ट, उपभोक्ता-अनुकूल और बड़े पैमाने पर उत्पादन योग्य होना चाहिए। इसके लिए क्षेत्रीय स्तर पर लोकप्रिय सामग्री और स्वादों को प्राथमिकता देने की सलाह दी गई है। संभावित उत्पादों में फोर्टिफाइड स्नैक्स, एनर्जी बार, चिक्की, नमकीन उत्पाद, पेय पदार्थ, गमीज और चबाने योग्य खाद्य पदार्थ शामिल हैं।
आईसीएमआर और गेट्स फाउंडेशन की भूमिका
आईसीएमआर भारत में जैव-चिकित्सा अनुसंधान की सर्वोच्च संस्था है। यह स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के अधीन कार्य करती है। गेट्स फाउंडेशन वैश्विक स्वास्थ्य, पोषण और विकास कार्यक्रमों के क्षेत्र में कार्यरत एक प्रमुख संस्था है। भारत में यह मातृ स्वास्थ्य, नवजात स्वास्थ्य, बाल स्वास्थ्य और पोषण से संबंधित अनेक परियोजनाओं में सहयोग करती रही है। दोनों संस्थाओं ने 12 मार्च 2024 को एक समझौता पत्र (Letter of Agreement) पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत पोषण और स्वास्थ्य अनुसंधान में सहयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।
एनीमिया नियंत्रण में खाद्य फोर्टिफिकेशन का महत्व
फोर्टिफिकेशन वह प्रक्रिया है जिसमें खाद्य पदार्थों में आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों को मिलाकर उनका पोषण मूल्य बढ़ाया जाता है। आयरन फोर्टिफिकेशन को एनीमिया नियंत्रण के प्रभावी उपायों में से एक माना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आयरन युक्त खाद्य उत्पादों को व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराया जाए, तो एनीमिया की समस्या को कम करने में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की जा सकती है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- आईसीएमआर की स्थापना वर्ष 1911 में ‘इंडियन रिसर्च फंड एसोसिएशन’ के रूप में हुई थी।
- वर्ष 1949 में इसका नाम बदलकर भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) रखा गया।
- एनीमिया सामान्यतः आयरन, फोलेट और विटामिन बी12 की कमी से जुड़ा होता है।
- फोर्टिफिकेशन खाद्य पदार्थों में सूक्ष्म पोषक तत्व जोड़ने की प्रक्रिया है।
- किशोरियां और प्रजनन आयु की महिलाएं एनीमिया नियंत्रण कार्यक्रमों का प्रमुख लक्ष्य समूह हैं।
- गेट्स फाउंडेशन वैश्विक स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका निभाता है।
आईसीएमआर और गेट्स फाउंडेशन की यह पहल भारत में एनीमिया नियंत्रण के लिए नवाचार-आधारित समाधान विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आयरन से भरपूर और किफायती खाद्य उत्पादों के विकास से लाखों किशोरियों और महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार लाने की संभावना है, जिससे देश के पोषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य लक्ष्यों को भी मजबूती मिलेगी।