आईसीएमआर की आई-ड्रोन पहल: ड्रोन तकनीक से टीबी जांच होगी तेज और सस्ती
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को आधुनिक तकनीक से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सामने आई है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने तेलंगाना के यादाद्री-भुवनगिरि जिले में अपनी आई-ड्रोन (i-DRONE) पहल के तहत ड्रोन के माध्यम से तपेदिक (टीबी) के थूक (स्पुटम) नमूनों के परिवहन का सफल परीक्षण किया है। इस अध्ययन में 840 प्रतिभागियों को शामिल किया गया। ड्रोन आधारित परिवहन व्यवस्था के कारण टीबी जांच की औसत रिपोर्ट आने का समय 15 दिनों से घटकर केवल 5 दिन रह गया। इसके साथ ही मरीजों का आर्थिक बोझ भी उल्लेखनीय रूप से कम हुआ।
आई-ड्रोन पहल क्या है?
आई-ड्रोन (i-DRONE) पहल का उद्देश्य ड्रोन तकनीक का उपयोग कर स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक तेज, सुलभ और प्रभावी बनाना है। इस परियोजना में मानव रहित हवाई वाहन (ड्रोन) के माध्यम से टीबी के स्पुटम नमूनों को दूरस्थ स्वास्थ्य केंद्रों से प्रयोगशालाओं तक पहुंचाया गया। इससे कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में लंबी सड़क यात्रा पर निर्भरता कम हुई और जांच प्रक्रिया में तेजी आई। यह पहल भविष्य में अन्य चिकित्सा सेवाओं के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है।
हब-एंड-स्पोक मॉडल से बेहतर स्वास्थ्य सुविधा
इस परियोजना में हब-एंड-स्पोक मॉडल अपनाया गया, जिसके तहत 11 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी), 60 उप-केंद्र और चार टीबी इकाइयों को एकीकृत नमूना संग्रह एवं परिवहन नेटवर्क से जोड़ा गया। मरीजों को अब दूर स्थित प्रयोगशालाओं तक जाने की आवश्यकता नहीं रही। वे अपने नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र में ही स्पुटम नमूना जमा कर सके, जिसे ड्रोन के माध्यम से जांच केंद्र तक पहुंचाया गया। इससे समय की बचत के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच भी बढ़ी।
मरीजों का खर्च और समय दोनों में कमी
आईसीएमआर के अध्ययन के अनुसार, पारंपरिक व्यवस्था में टीबी जांच के लिए मरीजों का औसत प्रत्यक्ष खर्च लगभग 9,451 रुपये था, जो ड्रोन आधारित प्रणाली लागू होने के बाद घटकर लगभग 91 रुपये रह गया। इस बड़ी कमी का मुख्य कारण यात्रा व्यय में कमी, मजदूरी के नुकसान में कमी तथा निकटतम स्वास्थ्य केंद्र पर नमूना जमा करने की सुविधा रही। इसके अलावा जांच रिपोर्ट जल्दी मिलने से समय पर उपचार शुरू करना भी संभव हुआ, जिससे रोग नियंत्रण में मदद मिलेगी।
सार्वजनिक स्वास्थ्य में ड्रोन तकनीक का महत्व
टीबी जैसी संक्रामक बीमारी के नियंत्रण में समय पर जांच और उपचार अत्यंत आवश्यक है। ड्रोन तकनीक के उपयोग से नमूनों का शीघ्र परिवहन संभव हुआ, जिससे प्रयोगशालाओं तक पहुंचने में लगने वाला समय काफी कम हो गया। विशेष रूप से दुर्गम और ग्रामीण क्षेत्रों में यह तकनीक स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक प्रभावी बना सकती है। आईसीएमआर का यह अध्ययन दर्शाता है कि आधुनिक तकनीक के माध्यम से सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को अधिक सुलभ, किफायती और कुशल बनाया जा सकता है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- तपेदिक (टीबी) माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नामक जीवाणु से होने वाला संक्रामक रोग है।
- भारत में टीबी नियंत्रण और उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (National Tuberculosis Elimination Programme – NTEP) संचालित किया जाता है।
- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) ग्रामीण भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में मरीजों के लिए पहला संपर्क केंद्र होते हैं।
- आउट-ऑफ-पॉकेट व्यय का अर्थ है स्वास्थ्य सेवाओं पर मरीज द्वारा अपनी जेब से किया गया प्रत्यक्ष खर्च।
आईसीएमआर की आई-ड्रोन पहल यह साबित करती है कि स्वास्थ्य सेवाओं में आधुनिक तकनीक का समुचित उपयोग न केवल जांच प्रक्रिया को तेज बना सकता है, बल्कि मरीजों के आर्थिक बोझ को भी काफी हद तक कम कर सकता है। यदि इस मॉडल का विस्तार देश के अन्य दूरस्थ और कठिन क्षेत्रों में किया जाता है, तो यह टीबी सहित कई अन्य बीमारियों के समयबद्ध निदान और उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है तथा भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र को और अधिक सशक्त बना सकता है।