आईआईटी गुवाहाटी की नई माइक्रोएल्गी तकनीक से कार्बन कैप्चर को मिली रफ्तार
आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने कार्बन डाइऑक्साइड को पकड़ने, माइक्रोएल्गी की बायोमास वृद्धि बढ़ाने और जैव-ऊर्जा उत्पादन को बेहतर बनाने के लिए एक दो-चरणीय खेती प्रक्रिया विकसित की है। यह अध्ययन रिन्यूएबल एनर्जी जर्नल में प्रकाशित हुआ है और इसमें रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग के प्रोफेसर कौस्तुभा मोहंती तथा शोधार्थी दीपेश सिंह चौहान शामिल रहे।
दो चरणों में खेती का नया मॉडल
इस तकनीक की खासियत यह है कि माइक्रोएल्गी को पहले चरण में 15% कार्बन डाइऑक्साइड वाले वातावरण में रखा जाता है, ताकि उसकी वृद्धि तेज हो सके। दूसरे चरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा घटाकर 5% कर दी जाती है और साथ में कैल्शियम तथा फॉस्फोरस मिलाए जाते हैं। इससे pH संतुलित रहता है, पोषक तत्वों की कमी कम होती है और प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया लंबे समय तक बनी रहती है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह तरीका पारंपरिक विधियों की तुलना में अधिक प्रभावी साबित हुआ, क्योंकि इसमें कार्बन उपयोग और जैविक उत्पादन दोनों में सुधार दर्ज किया गया।
प्रयोगशाला परीक्षण में बेहतर परिणाम
इस प्रक्रिया का परीक्षण दो लीटर के बबल-कॉलम फोटोबायोरिएक्टर में किया गया। यह एक नियंत्रित प्रणाली होती है, जिसमें प्रकाश, तापमान और गैस की आपूर्ति को नियंत्रित कर माइक्रोएल्गी की खेती की जाती है। परीक्षण में इस प्रणाली ने पारंपरिक तरीकों की तुलना में 25.7% अधिक बायोमास उत्पादन और 35.4% अधिक कार्बन डाइऑक्साइड फिक्सेशन दिखाया।
इसके अलावा, लिपिड उत्पादकता 1.86 गुना अधिक रही और कुल आंतरिक जैव-ऊर्जा दक्षता में 37.65% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। ये आंकड़े बताते हैं कि यह तकनीक केवल कार्बन कैप्चर तक सीमित नहीं है, बल्कि ऊर्जा उत्पादन की संभावनाओं को भी मजबूत करती है।
कम ऊर्जा में आसान हार्वेस्टिंग
दूसरे चरण में कैल्शियम जोड़ने से माइक्रोएल्गी में सेल्फ-फ्लोकुलेशन की प्रक्रिया शुरू हुई। इसका अर्थ है कि कोशिकाएं आपस में जुड़कर बड़े समूह बना लेती हैं, जिससे उन्हें अलग करना आसान हो जाता है। इस गुण के कारण बायोमास की रिकवरी 98.46% तक पहुंच गई, वह भी बिना अधिक ऊर्जा खर्च किए।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- माइक्रोएल्गी प्रकाश संश्लेषण करने वाले सूक्ष्म जीव हैं, जो कार्बन डाइऑक्साइड और सूर्य प्रकाश का उपयोग करके बायोमास बनाते हैं।
- फोटोबायोरिएक्टर नियंत्रित वातावरण में माइक्रोएल्गी की खेती के लिए इस्तेमाल होने वाली प्रणाली है।
- माइक्रोएल्गी से प्राप्त लिपिड का उपयोग बायोफ्यूल और अन्य जैव-ऊर्जा अनुप्रयोगों में किया जा सकता है।
- सेल्फ-फ्लोकुलेशन माइक्रोएल्गी की कम-ऊर्जा वाली हार्वेस्टिंग तकनीक मानी जाती है।
आईआईटी गुवाहाटी की यह उपलब्धि कार्बन उपयोग, स्वच्छ ऊर्जा और जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक व्यावहारिक दिशा दिखाती है। बढ़ते उत्सर्जन के दौर में ऐसी तकनीकें भविष्य में औद्योगिक कार्बन प्रबंधन के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं।