अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट ने विवाह समाप्त किया
हाल ही में Supreme Court of India ने एक महत्वपूर्ण फैसले में वैवाहिक विवाद में कानूनी प्रक्रियाओं के दुरुपयोग पर सख्त रुख अपनाते हुए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विवाह को समाप्त कर दिया। यह मामला इस बात का उदाहरण है कि अदालत “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने के लिए अपने विशेष अधिकारों का उपयोग कैसे करती है।
विवाद की पृष्ठभूमि
इस मामले में पति-पत्नी के बीच आपसी सहमति से तलाक के लिए एक समझौता हुआ था। समझौते के तहत पति ने 75 लाख रुपये की पहली किस्त, 14 लाख रुपये की कार और सूचीबद्ध आभूषण पत्नी को सौंप दिए थे। हालांकि, इन लाभों को प्राप्त करने के बाद पत्नी ने अपनी सहमति वापस ले ली और पति तथा उसके परिवार के खिलाफ घरेलू हिंसा का मामला दर्ज कर दिया।
आरोप और अदालत की टिप्पणियां
पत्नी ने आरोप लगाया कि पति ने 120 करोड़ रुपये के आभूषण और 50 करोड़ रुपये के सोने के बिस्कुट वापस नहीं किए। उसने यह भी दावा किया कि इन संपत्तियों को कर अधिकारियों से बचाने के लिए समझौते में शामिल नहीं किया गया। अदालत ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि ऐसे किसी भी संपत्ति का उल्लेख न तो समझौते में था और न ही निजी बातचीत में। न्यायालय ने इन आरोपों को “अत्यंत गंभीर और अनुचित” बताया।
अनुच्छेद 142 का उपयोग और कानूनी आधार
अदालत ने स्पष्ट किया कि एक बार जब दोनों पक्ष विधिवत प्रमाणित समझौते में प्रवेश कर लेते हैं, तो वह बाध्यकारी होता है और उसे मनमाने ढंग से वापस नहीं लिया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह के व्यवहार से मध्यस्थता प्रक्रिया की विश्वसनीयता कमजोर होती है। घरेलू हिंसा की शिकायत में भी ठोस आरोपों की कमी पाई गई, जिससे यह मामला प्रतिशोधात्मक प्रतीत हुआ।
न्यायालय का अंतिम निर्णय
अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए अदालत ने विवाह को समाप्त कर दिया और सभी सिविल एवं आपराधिक मामलों को रद्द कर दिया। साथ ही, पति को शेष 70 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया। यह फैसला न्यायिक प्रणाली के दुरुपयोग के प्रति अदालत की सख्ती को दर्शाता है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने के लिए विशेष अधिकार देता है।
- मध्यस्थता के तहत हुए समझौते, जब अदालत द्वारा मान्य होते हैं, कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं।
- घरेलू हिंसा के मामलों में ठोस और स्पष्ट आरोप आवश्यक होते हैं।
- कानूनी प्रावधानों के दुरुपयोग पर न्यायालय सख्त कार्रवाई कर सकता है।
अंततः, यह निर्णय दर्शाता है कि न्यायपालिका न केवल न्याय प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है, बल्कि कानूनी प्रक्रियाओं के दुरुपयोग को रोकने के लिए भी सजग है, जिससे न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता बनी रहती है।