भारतीय खेती का भाग्य बदलने वाली वो ऐतिहासिक क्रांति जिसने देश को भुखमरी से बचाया
भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां की लगभग आधी आबादी आज भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती-किसानी से जुड़ी हुई है। हर साल 23 दिसंबर को देश में राष्ट्रीय किसान दिवस यानी कृषक दिवस मनाया जाता है। यह दिन भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है, जिन्होंने किसानों के अधिकारों और जमींदारी प्रथा के खात्मे के लिए जीवनभर संघर्ष किया। लेकिन इस विशेष दिन पर भारतीय कृषि के उस सबसे बड़े मोड़ को समझना बेहद जरूरी है, जिसने भारत को एक लाचार और भूखे देश से बदलकर दुनिया का अनाज भंडार बना दिया। यह कहानी है भारत की ‘हरित क्रांति’ यानी ग्रीन रेवोल्यूशन की, जो सिर्फ खेती का आधुनिकीकरण नहीं थी, बल्कि भारत की संप्रभुता और सम्मान की लड़ाई थी।
जब अमेरिका की शर्तों पर पल रहा था भारत
साल 1960 के दशक की शुरुआत में भारत की स्थिति बेहद नाजुक थी। देश हाल ही में गुलामी के दौर से बाहर निकला था, आबादी तेजी से बढ़ रही थी और खेती पूरी तरह से मानूसन के भरोसे थी। लगातार दो साल (1964 और 1965) पड़े भयंकर सूखे ने देश की कमर तोड़ दी। भारत में अनाज की इतनी भारी कमी हो गई थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को देशवासियों से हफ्ते में एक दिन उपवास रखने की अपील करनी पड़ी थी। उस समय भारत अपनी जनता का पेट भरने के लिए पूरी तरह से अमेरिका के ‘पीएल-480’ (Public Law 480) कार्यक्रम के तहत मिलने वाले गेहूं पर निर्भर था। अमेरिका जो गेहूं भारत भेजता था, वह बेहद घटिया दर्जे का होता था, जिसे वहां के जानवर भी नहीं खाते थे। इतना ही नहीं, अमेरिका इस अनाज की मदद से भारत पर अपनी राजनीतिक शर्तें थोपने की कोशिश कर रहा था। भारतीय नेतृत्व को यह समझ आ गया था कि अगर देश को असली आजादी चाहिए, तो सबसे पहले अन्न के मामले में आत्मनिर्भर होना पड़ेगा।
तीन नायकों की तिकड़ी और मैक्सिको का जादुई बीज
इस गंभीर संकट से निपटने के लिए भारत सरकार ने एक साहसिक फैसला लिया। भारतीय कृषि के इतिहास को बदलने में तीन लोगों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही। तत्कालीन कृषि मंत्री सी. सुब्रमण्यम, महान कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन और मैक्सिको के वैज्ञानिक नॉर्मन बोरलॉग। डॉ. स्वामीनाथन ने मैक्सिको में डॉ. बोरलॉग द्वारा विकसित किए गए गेहूं के अर्ध-बौने (Semi-Dwarf) बीजों की क्षमता को पहचाना। पारंपरिक भारतीय गेहूं के पौधे बहुत लंबे होते थे, जो तेज हवा चलने या ज्यादा खाद डालने पर गिर जाते थे, जिससे फसल बर्बाद हो जाती थी। मैक्सिको के बीजों की खासियत यह थी कि इनके पौधे छोटे और मजबूत थे, जो भारी मात्रा में अनाज का वजन संभाल सकते थे और इन पर खाद और पानी का असर बहुत तेजी से होता था। भारत सरकार ने तमाम विरोधों और जोखिमों के बावजूद 1966 में मैक्सिको से कई टन हाइब्रिड बीज आयात किए। यह भारतीय कृषि के इतिहास का सबसे बड़ा जुआ था, जो पूरी तरह सफल रहा।
वो बदलाव जिसने खेतों को ‘अनाज की फैक्ट्री’ बना दिया
हरित क्रांति केवल नए बीजों को बोने तक सीमित नहीं थी। यह पारंपरिक खेती को एक आधुनिक, तकनीक-आधारित बिजनेस मॉडल में बदलने की शुरुआत थी। इस क्रांति के मुख्य स्तंभ कुछ इस तरह थे:
उच्च उपज वाले बीज (HYV Seeds)
मैक्सिको के बीजों से ‘कल्याण सोना’ और ‘सोनालिका’ जैसी भारतीय किस्में तैयार की गईं। इन बीजों से प्रति हेक्टेयर पैदावार तीन से चार गुना तक बढ़ गई।
रासायनिक खादों और कीटनाशकों का प्रवेश
नए बीजों को ज्यादा पोषण की जरूरत थी। इसलिए देश में पहली बार बड़े पैमाने पर यूरिया और अन्य रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल शुरू हुआ।
सिंचाई के साधनों का विस्तार
नदियों और बारिश पर निर्भरता कम करने के लिए ट्यूबवेल और नहरों का जाल बिछाया गया। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सिंचाई की आधुनिक व्यवस्था की गई।
कृषि यंत्रीकरण
खेतों में बैलों की जगह ट्रैक्टर, थ्रेशर और कंबाइन हार्वेस्टर जैसी मशीनों ने ले ली, जिससे समय की बचत हुई और बड़े पैमाने पर खेती करना संभव हो पाया।
महज कुछ सालों में पलटा भारत का नसीब
हरित क्रांति के परिणाम इतने अकल्पनीय थे कि इसने दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों को हैरान कर दिया। जिस भारत को लेकर पश्चिमी देश भविष्यवाणी कर रहे थे कि यहां करोड़ों लोग भुखमरी से मर जाएंगे, उसने अनाज उत्पादन के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।
| फसल | 1960 के दशक का औसत उत्पादन (टन) | 1970 के दशक का औसत उत्पादन (टन) | असर |
| गेहूं | लगभग 11-12 मिलियन | लगभग 20-24 मिलियन | उत्पादन दोगुने से ज्यादा हुआ |
| चावल | लगभग 30-35 मिलियन | लगभग 42-45 मिलियन | पैदावार में भारी बढ़ोतरी |
पंजाब और हरियाणा के किसान रातों-रात समृद्ध होने लगे। भारत ने न केवल अमेरिका से अनाज लेना बंद कर दिया, बल्कि कुछ ही वर्षों में वह अपनी जरूरत से ज्यादा अनाज का स्टॉक (बफर स्टॉक) रखने लगा। इसी आत्मनिर्भरता के कारण भारत ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान बिना किसी बाहरी दबाव के ऐतिहासिक जीत दर्ज की।
हरित क्रांति का दूसरा पहलू: अनकही चुनौतियां
सफलता की इस चमचमाती कहानी के पीछे कुछ ऐसी गंभीर चुनौतियां भी थीं, जिनका खामियाजा आज की पीढ़ी भुगत रही है। कृषक दिवस के मौके पर इन मुद्दों पर विचार करना भी जरूरी है। रासायनिक खादों और कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से खेतों की प्राकृतिक उपजाऊ क्षमता कम होने लगी। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में जमीन के नीचे का पानी (Groundwater) खतरनाक स्तर तक नीचे गिर गया क्योंकि धान जैसी फसलों को बहुत ज्यादा पानी की जरूरत होती है। इसके अलावा, इस क्रांति का फायदा शुरुआत में केवल बड़े किसानों को मिला, जिससे अमीर और गरीब किसानों के बीच की खाई चौड़ी हो गई।
आधुनिक भारत में कृषक दिवस की प्रासंगिकता
आज जब हम कृषक दिवस मनाते हैं, तो भारतीय कृषि एक बार फिर एक नए बदलाव के दौर से गुजर रही है। अब चुनौती सिर्फ पैदावार बढ़ाने की नहीं है, बल्कि खेती को पर्यावरण के अनुकूल और आर्थिक रूप से फायदेमंद बनाने की है। यही कारण है कि आज देश में ‘सस्टेनेबल फार्मिंग’ (टिकाऊ खेती), जैविक खेती (Organic Farming) और एग्रोटेक (AgriTech) पर जोर दिया जा रहा है। ड्रोन से कीटनाशकों का छिड़काव, एआई (AI) आधारित मौसम पूर्वानुमान और डिजिटल मंडियों ने किसानों को सीधे बाजार से जोड़ दिया है।
भारतीय खेती से जुड़े कुछ अनोखे और दिलचस्प तथ्य
- दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक: भारत आज दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है। इसके अलावा दूध, जूट और मसालों के उत्पादन में भी भारत दुनिया में पहले नंबर पर है।
- कृषि का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान: भारत की लगभग 18 प्रतिशत जीडीपी आज भी कृषि क्षेत्र से आती है, जो इसे देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनाती है।
- ट्रैक्टरों का सबसे बड़ा बाजार: भारत दुनिया का सबसे बड़ा ट्रैक्टर बाजार है। यहां हर साल लाखों की संख्या में ट्रैक्टर बेचे और इस्तेमाल किए जाते हैं।
- अनाज का सुरक्षा कवच: भारतीय खाद्य निगम (FCI) के पास मौजूद अनाज का बफर स्टॉक संकट के समय दुनिया के कई छोटे देशों की कुल आबादी को महीनों तक खिलाने के लिए काफी है।