CBAM विवाद में भारत की एंट्री से वैश्विक व्यापार तनाव बढ़ा

CBAM विवाद में भारत की एंट्री से वैश्विक व्यापार तनाव बढ़ा

भारत ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) में यूरोपीय संघ की कार्बन सीमा समायोजन व्यवस्था (CBAM) से जुड़े रूस के विवाद में तीसरे पक्ष के रूप में अपनी भागीदारी सुरक्षित रखी है। यह कदम ऐसे समय आया है जब कार्बन-आधारित व्यापार नियमों को लेकर विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच बहस तेज है।

CBAM क्या है और क्यों विवाद में है

CBAM यूरोपीय संघ की वह व्यापार व्यवस्था है, जो आयातित वस्तुओं में मौजूद कार्बन उत्सर्जन के आधार पर अतिरिक्त अनुपालन और कार्बन-लागत संबंधी शर्तें लागू करती है। इसका असर खासकर उन उत्पादों पर पड़ता है जिनमें उत्सर्जन अधिक होता है, जैसे इस्पात और एल्युमिनियम। यूरोपीय संघ का कहना है कि यह व्यवस्था कार्बन लीकेज रोकने और यूरोपीय उद्योगों की रक्षा के लिए जरूरी है, जबकि कई देश इसे व्यापार पर अतिरिक्त बाधा मानते हैं।

WTO में भारत की भूमिका

जिनेवा में 25 सितंबर 2026 को WTO विवाद निपटान निकाय ने रूस के अनुरोध पर इस मामले में पैनल गठित करने पर सहमति दी। इसी प्रक्रिया के दौरान भारत सहित 18 देशों ने तीसरे पक्ष के अधिकार सुरक्षित रखे। तीसरे पक्ष के रूप में कोई सदस्य विवाद का मुख्य पक्ष बने बिना सुनवाई में अपनी राय रख सकता है, कानूनी प्रश्नों पर विचार प्रस्तुत कर सकता है और मामले की प्रगति पर नजर रख सकता है।

भारत के अलावा अर्जेंटीना, ब्राजील, कनाडा, चीन, जापान, सऊदी अरब, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों ने भी यह अधिकार सुरक्षित रखा है। इससे साफ है कि CBAM केवल यूरोप-रूस विवाद नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था से जुड़ा व्यापक मुद्दा बन चुका है।

भारत के लिए इसका महत्व

भारत यूरोपीय संघ को इस्पात और एल्युमिनियम जैसे कार्बन-गहन उत्पादों का निर्यात करता है। CBAM के तहत इन निर्यातों पर अतिरिक्त लागत और अनुपालन शर्तें लागू हो सकती हैं, जिससे भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने की आशंका है। इसलिए भारत का इस विवाद में तीसरे पक्ष के रूप में शामिल होना उसके व्यापार हितों की निगरानी और नियमों की व्याख्या को समझने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

यह मामला भारत के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि जलवायु नीति और व्यापार नीति अब एक-दूसरे से सीधे जुड़ती जा रही हैं। आने वाले समय में ऐसे नियमों का असर केवल यूरोप तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं और निर्यात रणनीतियों पर भी पड़ेगा।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना 1995 में हुई थी और इसका मुख्यालय जिनेवा, स्विट्जरलैंड में है।
  • WTO का विवाद निपटान निकाय व्यापार विवादों की जांच के लिए पैनल गठित करता है।
  • तीसरे पक्ष के अधिकार किसी सदस्य को विवाद में औपचारिक पक्ष बने बिना अपनी राय रखने की अनुमति देते हैं।
  • कार्बन लीकेज का अर्थ है उत्सर्जन-प्रधान उत्पादन का ऐसे देशों में स्थानांतरित होना जहां जलवायु नियम अपेक्षाकृत कमजोर हों।

CBAM विवाद में भारत की भागीदारी दिखाती है कि जलवायु-आधारित व्यापार उपाय अब अंतरराष्ट्रीय आर्थिक कूटनीति का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं। आने वाले महीनों में इस मामले पर WTO की प्रक्रिया पर कई देशों की नजर रहेगी।

Originally written on September 26, 2026 and last modified on September 26, 2026.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *