सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट में ‘पब्लिक व्यू’ की व्याख्या स्पष्ट की
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मई 2026 को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि जातिसूचक गालियां किसी निजी घर के अंदर और सार्वजनिक नजर से दूर दी जाती हैं, तो वे अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 के तहत अपराध नहीं मानी जाएंगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि एससी-एसटी एक्ट की कुछ धाराएं तभी लागू होती हैं जब अपमान या धमकी सार्वजनिक दृष्टि के भीतर दी गई हो। यह फैसला न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने सुनाया। अदालत ने एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) में प्रयुक्त “पब्लिक व्यू” यानी सार्वजनिक दृष्टि की व्याख्या की।
क्या है एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम
अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 का उद्देश्य दलितों और आदिवासियों के खिलाफ होने वाले भेदभाव, अपमान और हिंसा को रोकना है। इस कानून के तहत जातिसूचक अपमान, धमकी और उत्पीड़न को गंभीर अपराध माना जाता है। धारा 3(1)(r) किसी अनुसूचित जाति या जनजाति के व्यक्ति का जानबूझकर अपमान या धमकी देकर उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित करने से संबंधित है। वहीं धारा 3(1)(s) सार्वजनिक दृष्टि में जातिसूचक गालियां देने को अपराध मानती है।
क्या था पूरा मामला
यह मामला ‘गुंजन उर्फ गिरिजा कुमारी बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य’ से जुड़ा था। विवाद दिल्ली में संपत्ति को लेकर उत्पन्न हुआ था। जनवरी 2021 में कीर्ति नगर पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज कराई गई थी, जिसमें चार पारिवारिक सदस्यों पर जातिसूचक टिप्पणियां और आपराधिक धमकी देने का आरोप लगाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि कथित घटना घर की चारदीवारी के भीतर हुई थी और वहां आम जनता मौजूद नहीं थी। इसी आधार पर अदालत ने एफआईआर और आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने किन पुराने फैसलों का दिया हवाला
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वरण सिंह बनाम राज्य, हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य तथा करुप्पुडायर बनाम राज्य जैसे पुराने मामलों का उल्लेख किया। इन मामलों में भी अदालत ने “पब्लिक व्यू” की कानूनी व्याख्या को स्पष्ट किया था। अदालत ने कहा कि केवल निजी स्थान पर हुई घटना अपने आप में एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं बनती, जब तक कि वह सार्वजनिक दृष्टि में न हुई हो।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम वर्ष 1989 में लागू किया गया था।
- धारा 3(1)(r) जानबूझकर अपमान और धमकी से संबंधित है।
- धारा 3(1)(s) सार्वजनिक दृष्टि में जातिसूचक गाली देने को अपराध मानती है।
- भारतीय दंड संहिता की धारा 506 आपराधिक धमकी से संबंधित है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एससी-एसटी एक्ट की कानूनी व्याख्या और उसके दायरे को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे भविष्य में ऐसे मामलों में “पब्लिक व्यू” की शर्त को लेकर स्पष्ट दिशा मिलेगी।