सागरमंथन 2026: समुद्री सहयोग और ब्लू इकॉनमी पर भारत बनेगा वैश्विक मंच
नई दिल्ली में 7 से 9 अक्टूबर 2026 के बीच होने वाला सागरमंथन: द ग्रेट ओशन्स डायलॉग समुद्री क्षेत्र पर दुनिया के बड़े संवादों में से एक बनने जा रहा है। तीसरे संस्करण में करीब 75 देशों से 1,200 से अधिक वक्ताओं, प्रतिनिधियों और प्रतिभागियों के शामिल होने की उम्मीद है। यह आयोजन समुद्री व्यापार, तकनीक, सतत विकास और महासागरीय शासन जैसे मुद्दों पर वैश्विक विमर्श को आगे बढ़ाएगा।
भारत में समुद्री कूटनीति का बढ़ता मंच
सागरमंथन की शुरुआत 2024 में नई दिल्ली में एक वार्षिक समुद्री संवाद के रूप में हुई थी। इसे ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन और भारत के पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के संयुक्त सहयोग से आयोजित किया जाता है। इस मंच का उद्देश्य नीति-निर्माताओं, उद्योग जगत के नेताओं, शोधकर्ताओं और बहुपक्षीय संगठनों को एक साथ लाकर समुद्री क्षेत्र की चुनौतियों और अवसरों पर चर्चा करना है।
2026 की थीम और प्रमुख एजेंडा
इस बार की थीम “Blue Geographies, New Aspirations: Trade, Technology, and Trust at Sea” रखी गई है। यह थीम समुद्री क्षेत्र में व्यापार, तकनीकी नवाचार, भरोसेमंद सहयोग और टिकाऊ विकास की जरूरत को रेखांकित करती है। चर्चा के प्रमुख विषयों में समुद्री व्यापार, बंदरगाहों की कनेक्टिविटी, डिजिटल परिवर्तन, सतत शिपिंग, समुद्री लचीलापन, ब्लू इकॉनमी और महासागरीय शासन शामिल रहेंगे।
अंतरराष्ट्रीय भागीदारी से बढ़ेगा महत्व
2026 संस्करण में बेल्जियम, यूरोपीय आयोग, मॉरीशस और भूटान के मंत्री और प्रतिनिधि शामिल होने वाले हैं। जिन नामों का उल्लेख किया गया है, उनमें Annick De Ridder, Apostolos Tzitzikostas, Arvin Boolell और Chandra Bahadur Gurung शामिल हैं। इतनी व्यापक भागीदारी यह दिखाती है कि समुद्री मुद्दे अब केवल बंदरगाहों और शिपिंग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वैश्विक व्यापार, पर्यावरण और रणनीतिक सहयोग से भी गहराई से जुड़े हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- सागरमंथन: द ग्रेट ओशन्स डायलॉग एक वार्षिक समुद्री संवाद है, जिसकी शुरुआत 2024 में नई दिल्ली से हुई थी।
- यह आयोजन ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन और पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के सहयोग से होता है।
- ब्लू इकॉनमी का अर्थ समुद्री संसाधनों का सतत और आर्थिक रूप से उपयोग है।
- ओशन गवर्नेंस में समुद्रों और समुद्री संसाधनों से जुड़े नियम, संस्थान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग शामिल होते हैं।
समुद्री क्षेत्र पर केंद्रित यह संवाद भारत को वैश्विक समुद्री नीति बहस के केंद्र में लाने की क्षमता रखता है। 2026 का संस्करण व्यापार, तकनीक और भरोसे के नए मानकों पर अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाने की दिशा में अहम साबित हो सकता है।