वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की जीडीपी वृद्धि 7.7% रही

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की जीडीपी वृद्धि 7.7% रही

भारतीय अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2025-26 में मजबूत प्रदर्शन करते हुए 7.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। जनवरी से मार्च 2026 के दौरान चौथी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही, जिसने देश की आर्थिक गतिविधियों में निरंतर मजबूती का संकेत दिया। हालांकि, 5 जून 2026 को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अपने विकास अनुमान को घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया और मुद्रास्फीति का अनुमान बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत कर दिया। यह निर्णय वैश्विक और घरेलू आर्थिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

जीडीपी और सकल मूल्य वर्धन का महत्व

सकल घरेलू उत्पाद (GDP) किसी देश की सीमाओं के भीतर एक निश्चित अवधि में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के कुल बाजार मूल्य को दर्शाता है। यह किसी अर्थव्यवस्था के आकार और प्रदर्शन का सबसे महत्वपूर्ण व्यापक आर्थिक संकेतक माना जाता है। वहीं, वास्तविक सकल मूल्य वर्धन (Real GVA) आर्थिक गतिविधियों को करों और सब्सिडी के प्रभाव से अलग करके मापता है। वित्त वर्ष 2025-26 में वास्तविक जीवीए में 7.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो उत्पादन और सेवा क्षेत्रों में मजबूत गतिविधियों को दर्शाती है।

आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति की भूमिका

भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) में छह सदस्य होते हैं और यह भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 के तहत नीति रेपो दर निर्धारित करती है। 5 जून 2026 को आयोजित बैठक में समिति ने रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखने का निर्णय लिया। साथ ही, उसने अपनी “तटस्थ” नीति स्थिति को भी बरकरार रखा, जिसका अर्थ है कि फिलहाल बैंक न तो मौद्रिक नीति को सख्त करने और न ही नरम करने का स्पष्ट संकेत दे रहा है।

आर्थिक वृद्धि के प्रमुख कारक

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की आर्थिक वृद्धि को घरेलू मांग, निवेश गतिविधियों, विनिर्माण क्षेत्र, निर्माण क्षेत्र और सेवा क्षेत्र से मजबूत समर्थन मिला। बुनियादी ढांचे में निवेश और उपभोग खर्च में वृद्धि ने भी अर्थव्यवस्था को गति प्रदान की। हालांकि, आरबीआई ने अप्रैल 2026 में जारी 6.9 प्रतिशत के विकास अनुमान को जून 2026 में घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया। इसके पीछे पश्चिम एशिया में संघर्ष की स्थिति, ऊर्जा कीमतों में संभावित वृद्धि, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और मौसम संबंधी अनिश्चितताओं को प्रमुख कारण बताया गया है।

मुद्रास्फीति और नीति संबंधी चुनौतियां

आरबीआई ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए मुद्रास्फीति का अनुमान 4.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत कर दिया है। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में अनिश्चितता और मूल्य वृद्धि के द्वितीयक प्रभावों को इसके प्रमुख कारणों में शामिल किया गया है। यदि खाद्य और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी जारी रहती है, तो इसका असर उपभोक्ता महंगाई और आर्थिक गतिविधियों दोनों पर पड़ सकता है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • सकल घरेलू उत्पाद (GDP) किसी देश की अर्थव्यवस्था के आकार को मापने वाला प्रमुख व्यापक आर्थिक संकेतक है।
  • वास्तविक सकल मूल्य वर्धन (Real GVA) आर्थिक उत्पादन की गणना में करों और सब्सिडी को शामिल नहीं करता।
  • रेपो दर वह ब्याज दर है जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण प्रदान करता है।
  • आरबीआई की तटस्थ नीति स्थिति का अर्थ है कि वह मौद्रिक नीति को सख्त या नरम करने की दिशा में कोई स्पष्ट संकेत नहीं दे रहा है।

भारत की अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2025-26 में उल्लेखनीय मजबूती दिखाई है, लेकिन आगामी वर्ष में वैश्विक अनिश्चितताओं, ऊर्जा कीमतों और मुद्रास्फीति के दबाव जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। ऐसे में आरबीआई की संतुलित मौद्रिक नीति और घरेलू मांग को बनाए रखने वाले उपाय देश की आर्थिक स्थिरता और विकास के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

Originally written on June 6, 2026 and last modified on June 6, 2026.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *