लोकसभा में महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयकों पर गरमाई बहस
16 अप्रैल 2026 को लोकसभा में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन विधेयक की प्रस्तुति के साथ राजनीतिक माहौल काफी गर्म हो गया। विशेष तीन दिवसीय संसद सत्र के दौरान इस विधेयक को मत विभाजन के बाद पेश किया गया, जिसमें 251 सांसदों ने समर्थन किया जबकि 185 ने विरोध जताया। यह पहल देश में प्रतिनिधित्व की संरचना में बड़े बदलाव का संकेत देती है और इसे हाल के वर्षों के सबसे महत्वपूर्ण चुनावी सुधारों में से एक माना जा रहा है।
प्रमुख विधेयक और उनका उद्देश्य
सरकार ने इस दौरान तीन अहम विधेयक पेश किए—संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026, परिसीमन विधेयक, 2026 और संघ राज्य क्षेत्र कानून (संशोधन) विधेयक, 2026। खास बात यह है कि इन तीनों विधेयकों को एक पैकेज के रूप में जोड़ा गया है। इसका अर्थ है कि परिसीमन और अन्य संबंधित बदलाव तभी लागू होंगे जब संवैधानिक संशोधन विधेयक पारित होगा। इस रणनीति का उद्देश्य महिला आरक्षण को परिसीमन प्रक्रिया के साथ जोड़कर लागू करना है।
महिला आरक्षण का प्रस्तावित ढांचा
सरकार के अनुसार, परिसीमन के बाद लोकसभा की कुल सीटों की संख्या बढ़ाकर लगभग 815 की जा सकती है। इनमें से 272 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होने की संभावना है, जो कुल सीटों का एक-तिहाई हिस्सा होगा। इस व्यवस्था को 2026 के बाद होने वाली जनगणना और उसके आधार पर परिसीमन के बाद लागू किया जाएगा। सरकार का यह भी कहना है कि किसी भी राज्य की वर्तमान सीटों में कमी नहीं की जाएगी, बल्कि कुल सीटों में वृद्धि कर संतुलन बनाए रखा जाएगा।
विपक्ष की चिंताएं और राजनीतिक विवाद
इन विधेयकों को लेकर विपक्ष, विशेष रूप से दक्षिण भारत के दलों ने गंभीर आपत्तियां जताई हैं। उनका मानना है कि महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने से इसके लागू होने में देरी हो सकती है। साथ ही, उन्हें आशंका है कि जनसंख्या आधारित परिसीमन से राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में असंतुलन आ सकता है। कई नेताओं ने इसे राजनीतिक लाभ के लिए सीमाओं के पुनर्गठन का प्रयास भी बताया है। सदन में विरोध प्रदर्शन और तीखी बहस इस मुद्दे की संवेदनशीलता को दर्शाते हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- परिसीमन का अर्थ है जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण।
- भारत में संवैधानिक संशोधन के लिए संसद में विशेष बहुमत आवश्यक होता है।
- महिला आरक्षण का प्रस्ताव लंबे समय से लंबित रहा है और अब इसे लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।
- जनगणना के आंकड़े परिसीमन प्रक्रिया के लिए आधार प्रदान करते हैं।
अंततः, यह विधायी पहल केवल महिला आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक संरचना में व्यापक बदलाव का संकेत देती है। आने वाले दिनों में संसद में होने वाली चर्चा और मतदान यह तय करेंगे कि यह सुधार वास्तव में लागू हो पाएगा या नहीं, और इसका देश की राजनीति पर कितना गहरा प्रभाव पड़ेगा।