लक्कुंडी में LiDAR सर्वे से छिपे पुरातात्विक रहस्यों की तलाश
कर्नाटक के गदग जिले का लक्कुंडी अब आधुनिक तकनीक के जरिए अपने प्राचीन इतिहास को फिर से उजागर करने की दिशा में चर्चा में है। यहां छह महीने का LiDAR सर्वे और जियोस्पेशियल मैपिंग प्रोजेक्ट शुरू किया गया है, जिसका उद्देश्य जमीन के नीचे छिपी संरचनाओं, प्राचीन अवशेषों और कालयाण-चालुक्य काल से जुड़े संकेतों की पहचान करना है। यह काम बिना खुदाई किए डिजिटल तरीकों से किया जा रहा है, ताकि विरासत को नुकसान पहुंचाए बिना वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण हो सके।
क्या है यह सर्वे और क्यों अहम है
यह परियोजना कर्नाटक के पुरातत्व, संग्रहालय एवं विरासत विभाग और बेंगलुरु स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज के बीच हुए समझौता ज्ञापन के तहत चल रही है। LiDAR यानी Light Detection and Ranging एक लेजर-आधारित रिमोट सेंसिंग तकनीक है, जो सतह की सूक्ष्म ऊंचाई-नीचाई को मापकर उच्च-रिजॉल्यूशन मॉडल तैयार करती है। इसके साथ जियोग्राफिक इन्फॉर्मेशन सिस्टम, रिमोट सेंसिंग और ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार जैसी तकनीकों का उपयोग भी किया जा रहा है।
इन तकनीकों की खासियत यह है कि इनके जरिए जमीन के भीतर मौजूद दीवारों, दबी हुई संरचनाओं और पुराने बसाव के पैटर्न का पता लगाया जा सकता है, वह भी बिना खुदाई के। पुरातत्व में यह तरीका इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इससे स्थल की मूल बनावट सुरक्षित रहती है और शोध अधिक सटीक होता है।
लक्कुंडी की विरासत और लोककथाओं की वैज्ञानिक जांच
लक्कुंडी पश्चिमी चालुक्य या कालयाण-चालुक्य काल की मंदिर वास्तुकला, बावड़ियों और शिलालेखों के लिए जाना जाता है। स्थानीय परंपरा में इसे “101 कुएं और 101 मंदिरों” की भूमि कहा जाता है। अब इस लोकविश्वास की वैज्ञानिक जांच की जा रही है, ताकि यह समझा जा सके कि कितनी संरचनाएं वास्तव में मौजूद थीं और उनमें से कितनी आज भी जमीन के भीतर सुरक्षित हो सकती हैं।
2023 से अब तक यहां 70 स्मारकों की पहचान की जा चुकी है, जिनमें 32 मंदिर, 28 कुएं और सात अन्य संरचनाएं शामिल हैं। यह आंकड़ा बताता है कि लक्कुंडी केवल एक पुरातात्विक स्थल नहीं, बल्कि मध्यकालीन दक्कन की स्थापत्य परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
खुदाई से मिले संकेत और संरक्षण की योजना
लक्कुंडी में की गई खुदाई से अब तक बड़ी संख्या में पुरावशेष मिले हैं। पहले चरण में 1,500 से अधिक और दूसरे चरण में, जो 2 मई 2026 से शुरू हुआ, 1,800 से अधिक कलाकृतियां मिलीं। इन खोजों ने स्थल की ऐतिहासिक परतों को और गहराई दी है।
कर्नाटक सरकार ने लक्कुंडी में 44 विरासत स्थलों को राज्य संरक्षण देने की योजना बनाई है। इसके साथ ही तीन एकड़ में एक ओपन-एयर म्यूजियम बनाने का प्रस्ताव भी है, जहां 5,000 से अधिक संभावित पुरावशेषों को प्रदर्शित और दस्तावेजीकृत करने की तैयारी है। यह पहल संरक्षण, शोध और जन-जागरूकता, तीनों स्तरों पर महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- LiDAR एक लेजर-आधारित रिमोट सेंसिंग तकनीक है, जिसका उपयोग स्थलाकृति और पुरातात्विक मानचित्रण में किया जाता है।
- Ground Penetrating Radar जमीन के भीतर दबी वस्तुओं और परतों का पता लगाने में मदद करता है।
- कालयाण-चालुक्य काल 10वीं से 12वीं शताब्दी ईस्वी के बीच का माना जाता है।
- लक्कुंडी में कोटे वीरभद्रेश्वर मंदिर की खुदाई में नवपाषाण काल के अवशेष, जैसे पत्थर की कुल्हाड़ी और धूसर मिट्टी के बर्तन मिले हैं।
लक्कुंडी में चल रहा यह सर्वे दिखाता है कि आधुनिक विज्ञान और पुरातत्व मिलकर भारत की छिपी विरासत को नए तरीके से सामने ला सकते हैं। आने वाले महीनों में यह परियोजना दक्कन के इतिहास को और स्पष्ट करने में अहम भूमिका निभा सकती है।