मौर्य साम्राज्य: अशोक
अशोक भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण शासकों में से एक है। अशोक ने भारतीय महाद्वीप के सबसे बड़े राज्य का गठन किया था। विभिन्न स्थानों से प्राप्त अभिलेखों में उसे देवानामपियदस्सी कहकर संबोधित किया गया है। भब्रू अभिलेख में उसे प्रियदर्शी, जबकि मास्की में बुद्धशाक्य कहा गया है। मास्की, गुर्जरा, नित्तुर तथा उदगेलम अभिलेख में उसका नाम अशोक मिलता है। पुराणों में उसे अशोकवर्द्धन कहा गया है। रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में भी अशोक का उल्लेख मिलता है। 1837 ईसवी में सबसे पहले जेम्स प्रिंसप ने अशोक के लेखों को पढने में सफलता प्राप्त की थी।
बौद्ध ग्रंथों में अशोक के जीवन व उसकी नीतियों इत्यादि के बारे में विस्तृत वर्णन किया गया है। बौद्ध ग्रंथों के अन्सुआर अशोक की माता का नाम धम्म, पसादिका और सुभद्रांगी था। बौद्ध ग्रंथों में अशोक की पत्नी असिंधीमित्रा, महादेवी पद्मावती, तिष्यरक्षिता और प्रयाग स्तम्भ लेख में कारूवाकी का उल्लेख मिलता है। बौद्ध ग्रंथों में अशोक की दो पुत्रियों संघमित्रा तथा चारुमति एवं दो पुत्रों कुणाल और महेंद्र के नाम का उल्लेख मिलता है। पुत्र जलौक का उल्लेख राजतरंगिणी में तथा तीव्र का उल्ल्केह प्रयाग स्तम्भ लेख में मिलता है। अशोक ने बौद्ध धर्म को अपने राज्यकाल के दौरान संरक्षण प्रदान किया। बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अशोक ने काफी प्रयास किया। उसने विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में बौद्ध धर्म के ज्ञाताओं को धर्म प्रचार के लिए भेजा। अन्य धर्मों के प्रति भी अशोक सहिष्णु था।
राज्याभिषेक और विजय अभियान
राजपाठ हासिल करने के लिए अशोक को काफी संघर्ष कहा जाता है। अशोक 273 ईसा पूर्व गद्दी पर बैठा, किन्तु उसका राज्याभिषेक 4 वर्ष बाद 269 ईसा पूर्व में ही हो सकता। महावंश और दीघवंश के अनुसार अशोक ने अपने 99 भाइयों की हत्या की थी। दिव्यवादन, चीनी ग्रन्थ, फायुएन-चुलिन और तिब्बती लेखक तारानाथ भी उत्तराधिकार युद्ध का वर्णन करते हैं । इसके पश्चात् 269 ईसा पूर्व में अशोक राजगद्दी पर आसीन हुआ।
कलिंग युद्ध अशोक के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी। इस युद्ध में हुए नरसंहार से अशोक को ह्रदय को परिवर्तित कर दिया। युद्ध में हुई हिंसा से दुखी होकर अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया और शांति के सिद्धांत का पालन किया। अशोक ने अपने राज्याभिषेक के आठ वश बाद अर्थक 9वें वर्ष में कलिंग की विजय की। इसका उल्लेख उसके 13वें शिलालेख में मिलता है। हाथीगुम्फा अभिलेख से पता चलता है कि कलिंग विजय के समय संभवतः वहां का राजा नन्दराज था। कलिंग (वर्तमान ओडिशा) युद्ध 261 ईसा पूर्व में लड़ा गया था।
अशोक का साम्राज्य काफी विस्तृत था, उसका साम्राज्य भारत, नेपाल, पाकिस्तान, भूटान, अफ़ग़ानिस्तान, भूटान और म्यांमार तक फैला हुआ था। यह अब तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य है। यवन राजाओं से उनके कूटनीतिक सम्बन्ध थे। अशोक के 13वें शिलालेख से यह ज्ञात होता है कि उसके पांच यवन (ग्रीक) राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे, इनमे अंतीयोक, तुरमय, अन्तकिनी, मग और अलिक सुद्नर प्रमुख हैं।
धार्मिक दृष्टिकोण
आरम्भ में अशोक वैदिक धर्म का पालन करता था। 261 ईसा पूर्व में कलिंग युद्ध में हुए नरसंहार से प्रभावित होकर अशोका का ह्रदय परिवर्तन हुआ और उसने बौद्ध धर्म को स्वीकार किया। तत्पश्चात उसने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए काफी कार्य किया। कल्हण द्वारा रचित पुस्तक राजतरंगिणी के अनुसार व शैव धर्म का उपासक था। विभिन्न स्थानों से प्राप्त अभिलेखों में सर्वत्र उसे देवानापिया कहा गया है, जिसका अर्थ है देवताओं का प्रिय। इससे उसकी वैदिक धर्म में आस्था का संकेत मिलता है।
बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद अशोक ने शिकार और पशु हत्या का त्याग किया। उसने ब्राह्मणों , श्रमणों और गरीबों को दान दिया। इसके साथ-साथ उसने चिकित्सालय, पाठशाला और मार्गों का निर्माण करके कई जनकल्याण के कार्य भी किये। उपगुप्त ने अशोक को बौद्ध धर्म के दीक्षित किया था। एक उपासक के रूप में अशोक ने शासन के 10वें वर्ष बोधगया, 12वें वर्ष निगालीसागर और 20वें वर्ष लुम्बिनी की यात्रा की। निगालीसागर में कनकमुनि के स्तूप के संवर्धन किया। सारनाथ, साँची और कौशाम्बी के लघु स्तंभों से भी अशोक के बौद्ध धर्म का अनुयायी का प्रमाण मिलता है। बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अशोक ने नेपाल, श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया, मिस्र और यूनान में बौद्ध धर्म के विद्वानों को भेजा।
अशोक के अभिलेख
अशोक ने अपने राजकाल में कई महत्वपूर्ण अभिलेख जारी किये। यह अभिलेख भारतीय इतिहास के अध्ययन करने के लिए अति आवश्यक हैं। इन अभिलेखों से अशोक के काल की महत्वपूर्ण घटनाओं व उनके समय काल के बारे में अपेक्षाकृत सटीक जानकारी मिलती है। इन अभिलेखों में अशोक ने कई आदेश जारी किये थे। अशोक पहला शासक था जिसने अभिलेखों के द्वारा जनता को संबोधित किया। अभी तक अशोक के 47 से अधिक स्थलों पर अभिलेख प्राप्त हुए हैं, जिनकी संक्या 150 से भी अधिक है। अशोक के अभिलेख अभिलेख प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण किये गए है। उत्तर पश्चिम के अभिलेख में खरोष्ठी और अरमाइक लिपि का प्रयोग किया गया है। अफ़ग़ानिस्तान में यह अभिलेख भाषा अरमाइक और यूनानी दोनों भाषाओँ में उत्कीर्ण किये गए है।
स्तम्भ लेख एवं वृहत शिलालेख
अशोक द्वारा उत्कीर्ण करवाए गए अभिलेख स्तम्भ लेख व शिलालेख के रूप में स्तंभों, चट्टानों व गुफाओं पर खुदवाए गए थे। अशोक के 14 वृहत शिलालेख कालसी, शाहबाज़गढ़ी, मानसेहरा, सोपारा, धौली, जोगड़, गिरनार व येरागुडी नामक स्थानों से प्राप्त हुए हैं। धौली और जौगड के शिलालेखों पर 11वें, 12वें और 13वें शिलालेख उत्कीर्ण नहीं किये गये हैं। उनके स्थान पर दो अन्य लेख हैं जिसे पृथक कलिंग प्रज्ञापन कहा गया है। इनमे कलिंग राज्य के प्रति अशोके की शासन नीति के विषय में जानकारी मिलती है। इनका निर्माण शासकों द्वारा अपनी विजय के उपलक्ष्य में करवाया जाता था। कई अभिलेखों में शासक अपने आदेशों को उत्कीर्ण करवाता था, ताकि लोग उसे पढ़कर उसका अनुसरण कर सकें। सम्राट अशोक के स्तम्भ लेख प्राकृत भाषा में है। यह लौरियाअरराज, लौरियानन्दनगढ़, टोपरा-दिल्ली, मेरठ-दिल्ली, इलाहाबाद तथा रामपूरवा में स्थित है। इलाहबाद स्तम्भ लेख पहले कौशाम्बी में था। अकबार के शासनकाल में जहाँगीर द्वारा इसे इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) के किले में रखा गया। कौशाम्बी स्तम्भलेख में स्त्री महामात्र, अशोक की रानी कारूवाकी तथा पुत्र तीवर का उल्लेख है। इसे रानी का अभिलेख भी कहा जाता है। इन अभिलेखों में अशोक का देवानाम्प्रिय कहकर संबोधित किया गया है। अशोक के शिलालेखों से जानकारी मिलती है कि उसने बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करने के लिए भू-मध्य सागर के क्षेत्र तक प्रयास किये थे।
14 वृहत शिलालेख
पहला- इसमें पशुबलि की निंदा की गयी है
दूसरा- मनुष्यों और पशुओं दोनों की चिकित्सा व्यवस्था का उल्लेख। चोल, पांड्य, सत्तीयपुत्र एवं केरलपुत्र की चर्चा।
तीसरा- राजकीय अधिकारियों को हर पांचवे वर्ष दौरा करने का आदेश
चौथा- धम्मघोष की घोषणा
पांचवा- धम्म-महामात्रों की नियुक्ति के विषय में जानकारी
छठा- प्रतिवेदक की चर्चा
सातवाँ- सभी सम्प्रदायों के लिए सहिष्णुता का उल्लेख
आठवां- अशोक की धर्म यात्राओं का उल्लेख
नौंवा- कर्मकांडों की निंदा
दसवां- धम्म नीति की श्रेष्ठता पर बल
ग्याहरवां- धम्म नीति की व्याख्या
बाहरवां- सर्वधर्म, समभाव एवं स्त्री महामात्र की चर्चा
तेरहवां- कलिंग युद्ध का वर्णन
चौदहवाँ- अशोक द्वारा प्रजा को धार्मिक जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा
लघु शिलालेख एवं लघु स्तंभलेख
अशोक के लघु शिलालेख येरागुडी, ब्रह्मागिरी, सिद्धपुर, जतिन रामेश्वर, गोविमठ, मास्की, गुर्जरा, सहसाराम इत्यादि से प्राप्त हुए हैं। इन स्तम्भ लेखों में मुख्य रूप से धर्म तथा प्रशासनिक बातों का वर्णन किया गया है। लघु स्तम्भ लेखों पर अशोक की राज घोषणाओं का उल्लेख किया गया है। अशोक के प्रमुख लघु अभिलेख साँची सारनाथ, कौशाम्बी, तथा निगालीसागर से प्राप्त हुए हैं। रुम्मीदेई अभिलेख अशोका का सबसे छोटा अभिलेख है। अशोक के अन्य सभी अभिलेखों की विषयवस्तु प्रशासनिक है, जबकि रुम्मीदेई अभिलेख का विषय आर्थिक है। रुम्मीदेई स्तम्भलेख से मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था की जानकारी मिलती है।
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