मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्स्थापन के लिए भारत का पहला मानक तैयार करेगा बीआईएस

मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्स्थापन के लिए भारत का पहला मानक तैयार करेगा बीआईएस

भारत में मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण और पुनर्स्थापन को वैज्ञानिक एवं एकरूप दिशा देने की दिशा में भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) ने महत्वपूर्ण पहल की है। बीआईएस देश का पहला भारतीय मानक ‘रिस्टोरेशन ऑफ मैंग्रोव इकोसिस्टम — गाइडलाइंस’ तैयार कर रहा है। इस मसौदा मानक को मार्च 2026 में सार्वजनिक किया गया था, जिस पर विभिन्न हितधारकों से सैकड़ों सुझाव प्राप्त हुए। इस पहल का उद्देश्य देश के विभिन्न तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव पुनर्स्थापन के लिए वैज्ञानिक, व्यावहारिक और पर्यावरण-अनुकूल दिशानिर्देश उपलब्ध कराना है।

भारत में मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र का महत्व

मैंग्रोव ऐसे लवण-सहिष्णु (हेलोफाइटिक) वन हैं जो ज्वारीय क्षेत्रों, नदी मुहानों, डेल्टा और सुरक्षित समुद्री तटों पर विकसित होते हैं। ये तटीय कटाव को रोकने, चक्रवातों और समुद्री तूफानों से सुरक्षा प्रदान करने, जैव विविधता को संरक्षित रखने तथा समुद्री जीवों के प्रजनन के लिए महत्वपूर्ण आवास उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाते हैं। भारत में मैंग्रोव वन पश्चिम बंगाल के सुंदरबन, गुजरात, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु तथा अंडमान-निकोबार एवं लक्षद्वीप जैसे द्वीपीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

बीआईएस की मानक निर्माण प्रक्रिया

भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) वर्ष 2016 के बीआईएस अधिनियम के तहत भारत का राष्ट्रीय मानक निर्धारण संस्थान है। यह तकनीकी समितियों के माध्यम से भारतीय मानकों का मसौदा तैयार करता है, उन्हें सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी करता है और हितधारकों की राय प्राप्त करने के बाद अंतिम अधिसूचना जारी करता है। मैंग्रोव पुनर्स्थापन के लिए एक समान मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करने हेतु वर्ष 2023 में ईईडी 06: डब्ल्यूजी 02 समिति का गठन किया गया था। 11 जून 2026 को झारखाली में आयोजित हितधारक बैठक में स्थानीय समुदायों ने पौधारोपण और पुनर्स्थापन से जुड़े अनेक सुझाव दिए, जिन्हें बीआईएस ने सकारात्मक रूप से स्वीकार किया।

पुनर्स्थापन के लिए प्रस्तावित दिशानिर्देश

मसौदा मानक में विभिन्न प्रकार के तटीय क्षेत्रों के अनुरूप मैंग्रोव पुनर्स्थापन की वैज्ञानिक विधियों का उल्लेख किया गया है। स्थानीय समुदायों ने पौधारोपण के दौरान पॉलीथीन की जगह कपड़े या जैव-अवक्रमणीय थैलों के उपयोग की सिफारिश की, जिसे बीआईएस ने शामिल करने पर सहमति जताई। इसके अलावा, उपयुक्त क्षेत्रों में फलदार वृक्षों के रोपण के माध्यम से स्थानीय लोगों की आजीविका को भी मैंग्रोव संरक्षण से जोड़ने का सुझाव दिया गया। हालांकि बीआईएस ने यह भी माना है कि भारत के विभिन्न मैंग्रोव क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां, ज्वारीय प्रभाव, लवणता और मानव बस्तियों का स्वरूप अलग-अलग होने के कारण एक समान राष्ट्रीय मानक तैयार करना चुनौतीपूर्ण है।

मिश्ती कार्यक्रम की भूमिका

मैंग्रोव संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2023 में मिश्ती (मैंग्रोव इनिशिएटिव फॉर शोरलाइन हैबिटैट्स एंड टैन्जिबल इनकम्स) कार्यक्रम शुरू किया था। इसका उद्देश्य नौ तटीय राज्यों और चार केंद्रशासित प्रदेशों में 540 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में मैंग्रोव का पुनर्स्थापन करना है। इस कार्यक्रम की अवधि 2029 तक बढ़ा दी गई है तथा अतिरिक्त 500 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ कुल बजट 600 करोड़ रुपये कर दिया गया है। 10 जुलाई 2026 तक मिश्ती के तहत छह राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को 88.40 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • मैंग्रोव लवण-सहिष्णु (हेलोफाइटिक) पौधे हैं, जो खारे तटीय वातावरण में विकसित होते हैं।
  • सुंदरबन भारत का सबसे बड़ा तथा विश्व के सबसे बड़े मैंग्रोव वनों में से एक है।
  • भारतीय मानक सामान्यतः स्वैच्छिक होते हैं, जब तक कि उन्हें किसी कानून या सरकारी आदेश के माध्यम से अनिवार्य न बनाया जाए।
  • भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) भारत का राष्ट्रीय मानक निर्धारण निकाय है और यह उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।

मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्स्थापन के लिए भारत का पहला राष्ट्रीय मानक तटीय पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे वैज्ञानिक पद्धतियों को बढ़ावा मिलेगा, स्थानीय समुदायों की भागीदारी मजबूत होगी और देश के संवेदनशील तटीय क्षेत्रों में जैव विविधता तथा आजीविका दोनों के संरक्षण को नई गति मिलने की उम्मीद है।

Originally written on July 13, 2026 and last modified on July 13, 2026.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *