मुंबई के वैज्ञानिकों ने विकसित किया ‘प्लेसेंटा-ऑन-चिप’, गर्भावस्था अनुसंधान में बड़ी उपलब्धि

मुंबई के वैज्ञानिकों ने विकसित किया ‘प्लेसेंटा-ऑन-चिप’, गर्भावस्था अनुसंधान में बड़ी उपलब्धि

भारत के वैज्ञानिकों ने जैव-चिकित्सा अनुसंधान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए प्रयोगशाला में विकसित ‘प्लेसेंटा-ऑन-चिप’ तकनीक तैयार की है। मुंबई स्थित शोधकर्ताओं द्वारा विकसित यह अत्याधुनिक माइक्रोफ्लूडिक प्लेटफॉर्म मानव प्लेसेंटा के प्रमुख कार्यों की प्रयोगशाला में नकल करने में सक्षम है। इस तकनीक से गर्भावस्था संबंधी शोध, नई दवाओं के परीक्षण तथा पशु-आधारित प्रयोगों पर निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण सहायता मिलने की उम्मीद है।

प्लेसेंटा-ऑन-चिप क्या है?

प्लेसेंटा-ऑन-चिप एक माइक्रोफ्लूडिक उपकरण है, जिसे नियंत्रित प्रयोगशाला वातावरण में मानव प्लेसेंटा के कार्यों का अनुकरण करने के लिए विकसित किया गया है। प्लेसेंटा गर्भावस्था के दौरान बनने वाला एक अस्थायी अंग है, जो मां से भ्रूण तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुंचाने तथा भ्रूण के रक्त से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने का कार्य करता है। इसके साथ ही यह हानिकारक तत्वों को भ्रूण तक पहुंचने से रोकने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

किन संस्थानों ने विकसित की यह तकनीक?

इस शोध परियोजना का नेतृत्व भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) बॉम्बे और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के अंतर्गत आने वाले नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन रिप्रोडक्टिव एंड चाइल्ड हेल्थ (एनआईआरआरसीएच), परेल, मुंबई ने संयुक्त रूप से किया है। इस परियोजना में आईआईटी बॉम्बे के रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग के प्रोफेसर अभिजीत मजूमदार, स्कूल ऑफ बायोसाइंसेज एंड बायोइंजीनियरिंग की प्रोफेसर देबजानी पॉल तथा एनआईआरआरसीएच के डॉ. दीपक मोदी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

तकनीकी विशेषताएँ और उपयोग

इस उपकरण को फोटोलिथोग्राफी और सॉफ्ट लिथोग्राफी जैसी आधुनिक माइक्रोइंजीनियरिंग तकनीकों की सहायता से तैयार किया गया है। यह प्लेटफॉर्म प्लेसेंटा की उस प्राकृतिक भूमिका की नकल करता है, जिसमें वह पोषक तत्वों के नियंत्रित आदान-प्रदान की अनुमति देता है और हानिकारक पदार्थों को भ्रूण तक पहुंचने से रोकता है। यह तकनीक दवा उद्योग के लिए नई औषधियों के सुरक्षित परीक्षण में उपयोगी होगी। इसके अलावा, गर्भावस्था से जुड़ी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं जैसे प्रीएक्लेम्प्सिया और गर्भकालीन मधुमेह (गेस्टेशनल डायबिटीज) के अध्ययन में भी यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इससे अधिक सटीक और नैतिक अनुसंधान को बढ़ावा मिलने की संभावना है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • प्लेसेंटा एक अस्थायी अंग है, जो मनुष्यों सहित स्तनधारी जीवों में गर्भावस्था के दौरान विकसित होता है।
  • प्रीएक्लेम्प्सिया गर्भावस्था के दौरान होने वाला एक गंभीर विकार है, जिसमें उच्च रक्तचाप और विभिन्न अंगों से जुड़ी जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
  • गर्भकालीन मधुमेह (गेस्टेशनल डायबिटीज) वह मधुमेह है, जिसका पहली बार पता गर्भावस्था के दौरान चलता है।
  • माइक्रोफ्लूडिक ऑर्गन-ऑन-चिप प्रणालियों का उपयोग प्रयोगशाला में मानव अंगों के कार्यों का अनुकरण करने के लिए किया जाता है।

इस नवीन तकनीक के पेटेंट की प्रक्रिया जारी है। इस शोध परियोजना को साइंस, इंजीनियरिंग एंड रिसर्च बोर्ड (एसईआरबी) के आईएमप्रिंट-II C कार्यक्रम से वित्तीय और तकनीकी सहयोग प्राप्त हुआ है। प्लेसेंटा-ऑन-चिप तकनीक भारत में चिकित्सा अनुसंधान, दवा विकास और मातृ-शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है, जो भविष्य में सुरक्षित और प्रभावी उपचार विकसित करने में नई संभावनाएँ खोल सकती है।

Originally written on July 4, 2026 and last modified on July 4, 2026.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *