भारत-जापान JCM से कार्बन सहयोग को नई गति

भारत-जापान JCM से कार्बन सहयोग को नई गति

भारत और जापान ने 30 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में संयुक्त क्रेडिटिंग मैकेनिज्म (JCM) का परिचालन मैनुअल जारी किया। यह कदम पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6.2 के तहत दोनों देशों के बीच उत्सर्जन घटाने वाले प्रोजेक्ट्स के लिए सहयोगी ढांचे को औपचारिक रूप देता है। इसका उद्देश्य कम-कार्बन परियोजनाओं को बढ़ावा देना, निवेश आकर्षित करना और तकनीक के हस्तांतरण को आसान बनाना है।

JCM क्या है और यह कैसे काम करता है

संयुक्त क्रेडिटिंग मैकेनिज्म भारत और जापान के बीच एक द्विपक्षीय कार्बन सहयोग ढांचा है। इसके तहत ऐसे प्रोजेक्ट्स को समर्थन मिलता है जो ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करते हैं या उसे टालते हैं। सत्यापन के बाद इन परियोजनाओं से जुड़े कार्बन क्रेडिट जारी किए जा सकते हैं और दोनों देशों के बीच स्थानांतरित भी किए जा सकते हैं।

यह व्यवस्था खास तौर पर उन गतिविधियों पर केंद्रित है जिनसे वास्तविक, मापनीय और सत्यापित उत्सर्जन कटौती हो। इसलिए यह केवल वित्तीय सहयोग नहीं, बल्कि जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने का व्यावहारिक माध्यम भी माना जा रहा है।

कौन-कौन से क्षेत्र शामिल हैं

JCM के दायरे में कई प्रमुख क्षेत्र रखे गए हैं, जिनमें नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, अपशिष्ट प्रबंधन, संपीड़ित बायोगैस, नवीकरणीय हाइड्रोजन और अमोनिया, तथा कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज शामिल हैं। इन क्षेत्रों का चयन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ये भारत की ऊर्जा संक्रमण प्रक्रिया और औद्योगिक डी-कार्बोनाइजेशन दोनों से सीधे जुड़े हैं।

इस ढांचे के तहत परियोजनाओं की क्रेडिटिंग अवधि 10 वर्ष तक सीमित है, जिसमें नवीनीकरण भी शामिल है। किसी भी विस्तार के लिए भारत की सक्षम प्राधिकरण की मंजूरी आवश्यक होगी। इससे परियोजनाओं पर नियामकीय निगरानी बनी रहती है और दीर्घकालिक जवाबदेही सुनिश्चित होती है।

शासन, सत्यापन और डबल काउंटिंग से बचाव

JCM के नियमों को 8 जून 2026 को अपनाया गया था। इसके संचालन की निगरानी दोनों सरकारों के प्रतिनिधियों वाली एक संयुक्त समिति करती है। यही समिति कार्यप्रणालियों, परियोजना स्वीकृति, क्रेडिट जारी करने, तृतीय-पक्ष सत्यापन और राष्ट्रीय रजिस्ट्रियों से जुड़े मामलों को देखती है।

राष्ट्रीय रजिस्ट्रियों का उपयोग इसलिए अहम है ताकि एक ही उत्सर्जन कटौती को दो बार गिना न जाए। जलवायु वित्त और कार्बन बाजारों में यह मुद्दा बेहद संवेदनशील माना जाता है, इसलिए पारदर्शी रिकॉर्ड-कीपिंग इस व्यवस्था की विश्वसनीयता बढ़ाती है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • पेरिस समझौते का अनुच्छेद 6.2 देशों को उत्सर्जन कटौती के लिए स्वैच्छिक सहयोग की अनुमति देता है।
  • JCM एक द्विपक्षीय कार्बन सहयोग तंत्र है, जिसका उपयोग जापान कई साझेदार देशों के साथ करता है।
  • कार्बन क्रेडिट तभी जारी होते हैं जब उत्सर्जन कटौती को मापा और सत्यापित किया जाए।
  • राष्ट्रीय रजिस्ट्रियां डबल काउंटिंग रोकने और क्रेडिट रिकॉर्ड सुरक्षित रखने में मदद करती हैं।

भारत-जापान JCM से साफ संकेत मिलता है कि जलवायु सहयोग अब केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि परियोजना-आधारित, सत्यापन-आधारित और निवेश-आधारित मॉडल की ओर बढ़ रहा है। आने वाले समय में यह ढांचा भारत में कम-कार्बन तकनीकों के प्रसार और हरित निवेश को नई दिशा दे सकता है।

Originally written on October 6, 2026 and last modified on October 6, 2026.

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