भारत के जलाशयों में घटता जलस्तर
भारत के प्रमुख जलाशयों में मई 2026 के मध्य तक जलभंडारण में गिरावट ने जल प्रबंधन, सिंचाई और मानसून पर निर्भरता को फिर चर्चा में ला दिया है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार 14 मई 2026 तक देश के 166 निगरानी वाले जलाशयों में कुल उपलब्ध लाइव स्टोरेज 63.232 अरब घन मीटर रह गया, जो कुल क्षमता का 34.45 प्रतिशत था।
जलाशयों की निगरानी और मौजूदा स्थिति
केंद्रीय जल आयोग देश के प्रमुख जलाशयों की साप्ताहिक निगरानी करता है। 30 अप्रैल 2026 को इन्हीं जलाशयों में 71.082 अरब घन मीटर पानी उपलब्ध था, जो 14 मई तक घटकर 63.232 अरब घन मीटर रह गया। यह गिरावट गर्मी के मौसम में बढ़ती मांग और सीमित जलप्रवाह को दर्शाती है।
कम भंडारण वाले प्रमुख जलाशय
14 मई 2026 तक 13 बड़े जलाशय सामान्य भंडारण के 50 प्रतिशत से नीचे पहुंच गए। इससे पहले 4 मई को ऐसे जलाशयों की संख्या नौ थी। इनमें असम का खांडोंग, झारखंड का चंदन डैम, कर्नाटक का तत्ताहल्ला, केरल का पेरियार, तमिलनाडु के अलीयार, करैयार और वैगई, तेलंगाना का प्रियदर्शिनी जुराला तथा पश्चिम बंगाल का कांगसाबती शामिल थे। झारखंड के चंदन डैम में 4 मई को जलभंडारण शून्य प्रतिशत दर्ज किया गया।
दक्षिण भारत में चिंता अधिक
दक्षिणी क्षेत्र में स्थिति अधिक संवेदनशील दिखाई दी, जहां 5 मई तक 36 जलाशय 40 प्रतिशत क्षमता से नीचे थे। तमिलनाडु के सलेम स्थित मेट्टूर बांध का जलस्तर 17 मई 2026 को 79.165 फीट पर था, जो महत्वपूर्ण सीमा से कम माना गया। यह बांध कावेरी डेल्टा की सिंचाई और कुरुवई धान फसल के लिए बेहद अहम है।
मानसून से जुड़ी उम्मीदें
भारत में जलाशयों की भरपाई मुख्य रूप से दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर करती है, जो सामान्यतः जून से सक्रिय होता है। यदि मानसून अच्छी वर्षा देता है, तो नदी प्रवाह और जलाशय भंडारण में सुधार हो सकता है। वहीं अल नीनो जैसी समुद्री स्थितियां वर्षा के पैटर्न को प्रभावित कर सकती हैं, इसलिए मौसम पूर्वानुमान और जल प्रबंधन दोनों महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- केंद्रीय जल आयोग भारत के 166 प्रमुख जलाशयों की निगरानी करता है।
- लाइव स्टोरेज वह उपयोगी जल होता है जो मृत भंडारण स्तर से ऊपर उपलब्ध रहता है।
- मेट्टूर बांध तमिलनाडु की कावेरी डेल्टा सिंचाई व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
- कुरुवई तमिलनाडु में उगाई जाने वाली कम अवधि की धान फसल है।
जलाशयों में घटता जलस्तर केवल जल संसाधन का मुद्दा नहीं, बल्कि कृषि, पेयजल और ऊर्जा सुरक्षा से भी जुड़ा विषय है। आने वाले मानसून की प्रगति इस स्थिति को सुधारने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।