पेरिस समझौते के पहले आर्टिकल 6.4 कार्बन क्रेडिट प्रोजेक्ट पर उठे सवाल

पेरिस समझौते के पहले आर्टिकल 6.4 कार्बन क्रेडिट प्रोजेक्ट पर उठे सवाल

संयुक्त राष्ट्र के पेरिस समझौते के तहत जारी किए गए पहले आर्टिकल 6.4 कार्बन क्रेडिट प्रोजेक्ट को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद खड़ा हो गया है। यह परियोजना म्यांमार में बेहतर ईंधन-कुशल चूल्हों (इम्प्रूव्ड कुकस्टोव्स) के वितरण से जुड़ी है और फरवरी 2026 में इसे आर्टिकल 6.4 तंत्र के अंतर्गत दुनिया की पहली कार्बन क्रेडिट जारी करने वाली परियोजना का दर्जा मिला था। हालांकि अब इस परियोजना के जलवायु प्रभाव, सत्यापन प्रक्रिया और म्यांमार की सैन्य सरकार से संभावित संबंधों को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं।

आर्टिकल 6.4 तंत्र क्या है?

पेरिस समझौते का आर्टिकल 6 अंतरराष्ट्रीय कार्बन बाजारों और उत्सर्जन व्यापार के लिए सहयोग का ढांचा प्रदान करता है। इसके अंतर्गत आर्टिकल 6.4 एक संयुक्त राष्ट्र-निगरानी वाली कार्बन बाजार व्यवस्था है, जिसके माध्यम से उत्सर्जन में कमी या कार्बन हटाने से जुड़े प्रमाणित क्रेडिट का व्यापार किया जा सकता है। इस तंत्र का संचालन संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (यूएनएफसीसीसी) के अंतर्गत गठित आर्टिकल 6.4 सुपरवाइजरी बॉडी द्वारा किया जाता है। फरवरी 2026 में इस निकाय ने म्यांमार के कुकस्टोव प्रोजेक्ट के लिए लगभग 60,000 कार्बन क्रेडिट जारी करने को मंजूरी दी थी।

परियोजना की संरचना और उद्देश्य

यह परियोजना दक्षिण कोरिया के गैर-सरकारी संगठन ‘क्लाइमेट चेंज सेंटर’ और म्यांमार के प्राकृतिक संसाधन एवं पर्यावरण संरक्षण मंत्रालय के सहयोग से संचालित की गई है। इसका उद्देश्य पारंपरिक चूल्हों के स्थान पर अधिक ईंधन-कुशल चूल्हों का उपयोग बढ़ाना है, जिससे लकड़ी और अन्य ईंधनों की खपत कम हो तथा कार्बन उत्सर्जन में कमी आए। परियोजना से उत्पन्न कुछ कार्बन क्रेडिट दक्षिण कोरिया को हस्तांतरित किए जाने के लिए अधिकृत किए गए हैं। इनका उपयोग दक्षिण कोरिया की उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) और उसकी राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित जलवायु प्रतिबद्धताओं (NDCs) को पूरा करने में किया जा सकता है। शेष क्रेडिट म्यांमार की राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं में योगदान देंगे।

उठे विवाद और आलोचनाएं

10 जून 2026 को म्यांमार पॉलिसी इंस्टीट्यूट, ग्लोबल फॉरेस्ट कोएलिशन और प्लान 1.5 द्वारा जारी रिपोर्ट में परियोजना से संबंधित कई चिंताएं सामने रखी गईं। रिपोर्ट में मानवाधिकार, प्रशासनिक पारदर्शिता, निगरानी व्यवस्था और सत्यापन प्रक्रियाओं को लेकर सवाल उठाए गए। नागरिक समाज संगठनों ने 10 और 11 जून 2026 को परियोजना को तत्काल निलंबित करने तथा स्वतंत्र जांच कराने की मांग की। उनका आरोप है कि परियोजना का संबंध ऐसे सरकारी संस्थानों से है जो फरवरी 2021 के बाद से म्यांमार की सैन्य सरकार के नियंत्रण में हैं। इसके अलावा, कार्बन मार्केट वॉच नामक संस्था ने भी दावा किया कि परियोजना द्वारा जलवायु लाभों का अनुमान वास्तविकता से अधिक दिखाया जा सकता है।

संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रिया

यूएनएफसीसीसी और आर्टिकल 6.4 सुपरवाइजरी बॉडी का कहना है कि परियोजना के लिए पर्यावरणीय सुरक्षा मानकों, निगरानी प्रणाली और शिकायत निवारण तंत्र की व्यवस्था की गई है। साथ ही, पुराने कार्बन बाजार तंत्रों की तुलना में इस परियोजना के लिए स्वीकृत क्रेडिट की संख्या लगभग 40 प्रतिशत कम कर दी गई है, ताकि पर्यावरणीय अखंडता बनी रहे। संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि यह प्रणाली कार्बन बाजारों में अधिक पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए विकसित की गई है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • पेरिस समझौता वर्ष 2015 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC) के तहत अपनाया गया था।
  • आर्टिकल 6 पेरिस समझौते का वह प्रावधान है जो अंतरराष्ट्रीय कार्बन बाजार सहयोग से संबंधित है।
  • राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) देशों द्वारा प्रस्तुत किए गए जलवायु लक्ष्य होते हैं।
  • उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) में उत्सर्जन परमिट और कार्बन क्रेडिट की खरीद-बिक्री की जाती है।
  • कार्बन क्रेडिट प्रमाणित उत्सर्जन कटौती या कार्बन हटाने का प्रतिनिधित्व करते हैं।

म्यांमार के कुकस्टोव प्रोजेक्ट को लेकर उठे विवाद ने वैश्विक कार्बन बाजारों की विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर नई बहस छेड़ दी है। एक ओर यह परियोजना पेरिस समझौते के तहत कार्बन व्यापार के नए युग की शुरुआत का प्रतीक मानी जा रही है, वहीं दूसरी ओर इसके प्रशासनिक और पर्यावरणीय पहलुओं पर उठे सवाल यह दर्शाते हैं कि कार्बन बाजारों की सफलता के लिए मजबूत निगरानी और जवाबदेही व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है।

Originally written on June 11, 2026 and last modified on June 11, 2026.

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