भारत की फ्यूजन रिसर्च को मिली नई रफ्तार
भारत ने फ्यूजन अनुसंधान के क्षेत्र में दो नए छोटे स्फेरिकल टोकामक जोड़कर अपनी वैज्ञानिक क्षमता को और मजबूत किया है। बेंगलुरु की प्रानोस फ्यूजन ने ‘प्रज्ञा’ विकसित किया है, जबकि गांधीनगर स्थित इंस्टीट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च (IPR) ने अपना कॉम्पैक्ट स्फेरिकल टोकामक तैयार कर प्लाज्मा प्रयोग शुरू कर दिए हैं। यह कदम भारत में उन्नत प्लाज्मा भौतिकी और चुंबकीय संरोधन आधारित फ्यूजन शोध के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रज्ञा: छोटा आकार, बड़ा शोध उद्देश्य
प्रज्ञा एक कॉम्पैक्ट, लो-एस्पेक्ट-रेशियो स्फेरिकल टोकामक है। सामान्य टोकामक की तुलना में इसका प्लाज्मा चैंबर अधिक सघन होता है, जिससे चुंबकीय क्षेत्र के भीतर प्लाज्मा के व्यवहार का अध्ययन अलग तरीके से किया जा सकता है। इसे 21 अगस्त 2026 को पूरा किया गया और 3 सितंबर 2026 को लॉन्च किया गया।
इस मशीन को केवल आठ महीनों में 12 सदस्यीय टीम ने तैयार किया, जिसका नेतृत्व शौर्य कौशल और रोशन जॉर्ज ने किया। प्रज्ञा का उद्देश्य बिजली उत्पादन नहीं, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले प्रयोगों के जरिए प्लाज्मा नियंत्रण और उच्च तापमान अतिचालक चुंबकों के परीक्षण को आगे बढ़ाना है।
आईपीआर की मशीन और पहले प्लाज्मा का महत्व
इंस्टीट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च ने 23 अगस्त 2026 को अपनी छोटी स्फेरिकल टोकामक मशीन की मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल इंटीग्रेशन पूरी की। इसके बाद 30 अगस्त 2026 को इसमें पहला प्लाज्मा हासिल किया गया। फ्यूजन शोध में यह चरण इसलिए अहम होता है क्योंकि इसी समय आयनित गैस को डिवाइस के भीतर सफलतापूर्वक सीमित और बनाए रखा जाता है।
7 सितंबर 2026 तक IPR के वैज्ञानिक इस मशीन पर 114 प्लाज्मा डिस्चार्ज कर चुके थे। शुरुआती प्रयोगों के दौरान आई विद्युत अस्थिरताओं को दूर करने के लिए चुंबकीय कॉइल्स में भी समायोजन किए गए। यह प्रक्रिया बताती है कि फ्यूजन उपकरणों में स्थिरता, नियंत्रण और सटीक इंजीनियरिंग कितनी महत्वपूर्ण होती है।
भारत की फ्यूजन संरचना और आगे की योजना
भारत की मौजूदा फ्यूजन रिसर्च संरचना में IPR का ADITYA-U टोकामक और SST-1 शामिल हैं। इसके अलावा भारत फ्रांस में बन रहे अंतरराष्ट्रीय फ्यूजन प्रयोग ITER में 9% हिस्सेदारी रखता है। ऐसे में प्रज्ञा और IPR की नई मशीनें देश के शोध आधार को और विविध बनाती हैं।
प्रानोस फ्यूजन, IPR और जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (JNCASR) के साथ सह-इनक्यूबेटेड है। कंपनी की योजना 2027 तक अपनी स्वदेशी HTS मैग्नेट तकनीक को परिचालन स्तर पर लाने और 2030 तक ‘प्रणीक’ नामक पूर्ण-स्तरीय रिएक्टर तैनात करने की है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- टोकामक एक चुंबकीय संरोधन उपकरण है, जिसका उपयोग फ्यूजन शोध में प्लाज्मा को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।
- स्फेरिकल टोकामक का आकार पारंपरिक टोकामक की तुलना में अधिक कॉम्पैक्ट होता है।
- ITER एक अंतरराष्ट्रीय फ्यूजन परियोजना है, जो फ्रांस में बन रही है।
- उन्नत फ्यूजन उपकरणों में उच्च तापमान अतिचालक चुंबकों का उपयोग किया जाता है।
इन नई मशीनों के साथ भारत ने यह संकेत दिया है कि वह फ्यूजन विज्ञान में केवल भागीदार नहीं, बल्कि तकनीकी नवाचार का सक्रिय केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।