भारत की खुली प्राकृतिक पारिस्थितिकियों पर पहली गाइड जारी
भारत ने घासभूमियों और अन्य खुली प्राकृतिक पारिस्थितिकियों (Open Natural Ecosystems) पर अपनी पहली विस्तृत गाइड 17 अगस्त 2026 को मंगोलिया के उलानबटार में आयोजित यूएनसीसीडी के COP17 में जारी की। यह दस्तावेज़ देश में पाए जाने वाले खुले आवासों की वैज्ञानिक पहचान, वर्गीकरण और संरक्षण जरूरतों को एक साथ प्रस्तुत करता है।
घासभूमियों से आगे बढ़कर खुली पारिस्थितिकियों पर फोकस
यह गाइड केवल घासभूमियों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के 24 प्रकार के खुले पारिस्थितिकी तंत्रों को वर्गीकृत करती है। इनमें हिमालयी और तराई घासभूमियाँ, दक्कन सवाना, थार और बन्नी के परिदृश्य, चट्टानी पठार, बीहड़, झाड़-झंखाड़ वाले क्षेत्र और तटीय पारिस्थितिकियाँ शामिल हैं। ऐसे क्षेत्र अक्सर वन-आधारित संरक्षण बहस में पीछे रह जाते हैं, जबकि ये जैव विविधता, चराई और स्थानीय आजीविका के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
नीति, शोध और समुदायों के लिए उपयोगी दस्तावेज़
इस गाइड को अशोक ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट (ATREE) ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा अन्य साझेदारों के साथ मिलकर तैयार किया है। दस्तावेज़ में पशुपालन, अग्नि पारिस्थितिकी और कार्बन पृथक्करण जैसे विषयों पर भी खंड शामिल हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि खुली पारिस्थितिकियों का प्रबंधन केवल संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि भूमि उपयोग, जलवायु और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है।
ओरण, गौचर और पारंपरिक भूमि उपयोग की पहचान
लॉन्च के दौरान केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने अजमेर, राजस्थान के ओरण और गौचर जैसे परिदृश्यों का उल्लेख किया। ओरण पश्चिमी भारत में समुदाय द्वारा संरक्षित पवित्र उपवन या साझा भूमि को कहा जाता है, जबकि गौचर गाँव की वह चरागाह भूमि है जिसका उपयोग पशुओं के लिए किया जाता है। इन उदाहरणों से यह संदेश गया कि स्थानीय समुदायों की पारंपरिक भूमि-प्रबंधन प्रणालियाँ भी संरक्षण का अहम हिस्सा हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- UNCCD का पूरा नाम United Nations Convention to Combat Desertification है, जो मरुस्थलीकरण से निपटने की वैश्विक संधि है।
- UNCCD को 1994 में अपनाया गया था।
- COP17, UNCCD ढांचे के तहत 17वीं कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज़ को दर्शाता है।
- ATREE बेंगलुरु स्थित एक प्रमुख शोध संस्थान है, जो पारिस्थितिकी और संरक्षण अध्ययन के लिए जाना जाता है।
यह गाइड भारत के उन खुले प्राकृतिक तंत्रों को वैज्ञानिक पहचान देती है, जिन्हें अक्सर कम आंका जाता है। नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं और संरक्षण कार्यकर्ताओं के लिए यह दस्तावेज़ भविष्य की संरक्षण रणनीतियों में एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है।