भारतीय किशोरों ने जीता द अर्थ प्राइज 2026, माइक्रोप्लास्टिक हटाने वाला ‘प्लास-स्टिक’ बना वैश्विक विजेता
भारत के तीन युवा नवप्रवर्तकों विवान छावछरिया, एरियाना अग्रवाल और अव्याना मेहता ने 1 जून 2026 को इतिहास रचते हुए द अर्थ प्राइज 2026 के पहले वैश्विक विजेता बनने का गौरव हासिल किया। 16 वर्षीय इन छात्रों को उनके अभिनव आविष्कार ‘प्लास-स्टिक’ के लिए सम्मानित किया गया, जो इमली के बीजों के अपशिष्ट से तैयार एक जैव-अवक्रमणीय जल शोधन तकनीक है। यह नवाचार जल में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक कणों को हटाने के लिए विकसित किया गया है और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस उपलब्धि ने भारतीय युवाओं की वैज्ञानिक सोच, नवाचार क्षमता और पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान में योगदान को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई है।
क्या है प्लास-स्टिक?
प्लास-स्टिक एक विशेष प्रकार का पाउडर है, जिसे जल में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक कणों को आकर्षित करने के लिए विकसित किया गया है। जब यह पाउडर पानी में मिलाया जाता है, तो माइक्रोप्लास्टिक कण आपस में चिपककर बड़े गुच्छों का निर्माण कर लेते हैं। इसके बाद इन गुच्छों को एक हैंडहेल्ड मैग्नेट की सहायता से आसानी से हटाया जा सकता है। इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें बिजली की आवश्यकता नहीं होती और इसकी लागत भी बहुत कम है। यही कारण है कि यह तकनीक ग्रामीण और सीमित संसाधनों वाले क्षेत्रों के लिए अत्यंत उपयोगी मानी जा रही है।
इमली के बीजों के अपशिष्ट का अभिनव उपयोग
प्लास-स्टिक के निर्माण में इमली के बीजों से निकलने वाले अपशिष्ट का उपयोग किया गया है। सामान्यतः कृषि अपशिष्ट के रूप में देखे जाने वाले इस पदार्थ को वैज्ञानिक तरीके से संसाधित कर ऐसा पदार्थ बनाया गया है जो माइक्रोप्लास्टिक कणों को बांधने और अवशोषित करने में सक्षम है। जल उपचार अनुसंधान में पौधों से प्राप्त अपशिष्ट पदार्थों का उपयोग लगातार बढ़ रहा है, क्योंकि ये पर्यावरण-अनुकूल होने के साथ-साथ कम लागत वाले विकल्प भी प्रदान करते हैं। प्लास-स्टिक इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण नवाचार के रूप में उभरा है।
आईआईटी गुवाहाटी का सहयोग
इस परियोजना के विकास के दौरान टीम को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी के विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। वैज्ञानिक सहयोग के माध्यम से इस तकनीक को और अधिक प्रभावी तथा व्यावहारिक बनाया गया। द अर्थ प्राइज 2026 में एशिया क्षेत्रीय विजेता बनने पर टीम को 12,500 अमेरिकी डॉलर की अनुदान राशि भी प्रदान की गई, जिसने परियोजना के विस्तार और जागरूकता कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने में सहायता की।
जागरूकता और भविष्य की योजनाएं
प्लास-स्टिक परियोजना केवल एक वैज्ञानिक आविष्कार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण शिक्षा और जन-जागरूकता से भी जुड़ी हुई है। अब तक यह टीम विभिन्न कार्यक्रमों, कार्यशालाओं और प्रदर्शनों के माध्यम से 8,000 से अधिक छात्रों और शिक्षकों तक पहुंच चुकी है। टीम का लक्ष्य वर्ष 2026 के अंत तक 35,000 से 40,000 छात्रों और शिक्षकों तक पहुंच बनाकर माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण और जल संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- माइक्रोप्लास्टिक ऐसे प्लास्टिक कण होते हैं जिनका आकार 5 मिलीमीटर से कम होता है।
- द अर्थ प्राइज युवा नवप्रवर्तकों के लिए आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय प्रतियोगिता है।
- इमली एक दलहनी वृक्ष है, जिसके बीजों का उपयोग खाद्य प्रसंस्करण और औद्योगिक क्षेत्रों में किया जाता है।
- भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी की स्थापना वर्ष 1994 में हुई थी और यह राष्ट्रीय महत्व का संस्थान है।
प्लास-स्टिक का विकास जल शोधन, अपशिष्ट से संसाधन निर्माण और माइक्रोप्लास्टिक नियंत्रण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है। भारतीय छात्रों की यह उपलब्धि दर्शाती है कि नवाचार और वैज्ञानिक सोच के माध्यम से पर्यावरणीय चुनौतियों का प्रभावी समाधान खोजा जा सकता है। यह सफलता आने वाली पीढ़ियों को भी सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित करेगी।