ब्रह्मोस बेल्ट रणनीति से हिंद-प्रशांत में नई सैन्य हलचल
भारत और रूस की संयुक्त ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली अब केवल एक हथियार नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सामरिक बहस का अहम हिस्सा बनती जा रही है। दक्षिण चीन सागर के आसपास समुद्री सुरक्षा, तटीय रक्षा और समुद्री अवरोधन की जरूरतों ने जिस “ब्रह्मोस बेल्ट” की अवधारणा को चर्चा में लाया है, वह क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन पर भी असर डाल सकती है। फिलीपींस को ब्रह्मोस के तटीय संस्करण की आपूर्ति और अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की रुचि ने इस विषय को और महत्वपूर्ण बना दिया है।
ब्रह्मोस बेल्ट क्या है और क्यों चर्चा में है
“ब्रह्मोस बेल्ट” से आशय दक्षिण चीन सागर के आसपास ऐसे तटीय क्षेत्रों की संभावित श्रृंखला से है, जहां सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों की तैनाती की जा सकती है। इसका उद्देश्य समुद्री मार्गों की सुरक्षा, तटीय रक्षा और संभावित आक्रामक नौसैनिक गतिविधियों को रोकना है। दक्षिण चीन सागर एशिया के सबसे संवेदनशील समुद्री क्षेत्रों में गिना जाता है, क्योंकि यह कई महत्वपूर्ण व्यापारिक और सामरिक समुद्री रास्तों से जुड़ा है।
फिलीपींस को 375 मिलियन डॉलर के अनुबंध के तहत ब्रह्मोस के शोर-आधारित संस्करण की आपूर्ति की गई है। यह संस्करण तटीय बैटरियों के रूप में तैनात किया जाता है और समुद्री लक्ष्यों के खिलाफ रक्षा क्षमता बढ़ाता है।
ब्रह्मोस प्रणाली की खासियतें
ब्रह्मोस भारत और रूस की संयुक्त परियोजना है, जिसे ब्रह्मोस एयरोस्पेस ने विकसित किया है। इसका नाम ब्रह्मपुत्र और मॉस्कवा नदियों के नामों से लिया गया है। यह मिसाइल अपनी सुपरसोनिक गति, समुद्र की सतह के बेहद करीब उड़ान भरने की क्षमता और अंतिम चरण में तेज प्रहार के लिए जानी जाती है।
इस प्रणाली के कई संस्करण उपलब्ध हैं, जिनमें भूमि-आधारित, जहाज-आधारित, पनडुब्बी-प्रक्षेपित और वायु-प्रक्षेपित संस्करण शामिल हैं। तटीय रक्षा के लिए इसका शोर-आधारित एंटी-शिप संस्करण विशेष रूप से उपयोगी माना जाता है, क्योंकि यह समुद्री क्षेत्र में रोकथाम और प्रतिरोधक क्षमता दोनों बढ़ाता है।
क्षेत्रीय खरीद और भारत-रूस सहयोग का महत्व
फिलीपींस के अलावा वियतनाम और इंडोनेशिया के साथ भी ब्रह्मोस खरीद को लेकर चर्चाएं जुड़ी रही हैं, हालांकि इनकी स्थिति अलग-अलग समय पर अलग रही है। थाईलैंड ने भी अंडमान सागर और थाईलैंड की खाड़ी के पास संभावित तैनाती के लिए इस प्रणाली का मूल्यांकन किया है। ये समुद्री क्षेत्र हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर से जोड़ने वाले प्रमुख मार्गों में आते हैं, इसलिए यहां किसी भी रक्षा तैनाती का रणनीतिक महत्व बढ़ जाता है।
भारत और रूस ब्रह्मोस के उन्नयन की भी योजना बना रहे हैं, ताकि इसकी परिचालन क्षमता और निर्यात प्रतिस्पर्धा बेहतर हो सके। यह भारत-रूस रक्षा सह-विकास का सबसे प्रमुख उदाहरणों में से एक बना हुआ है। साथ ही, भारत ने रक्षा निर्यात को समर्थन देने के लिए दूतावासों में रक्षा विंग्स की भूमिका भी बढ़ाई है। 2025-26 के लिए इस रक्षा-कूटनीति बजट को 400 करोड़ रुपये किया गया है और 2030 तक 85 से 90 रक्षा विंग्स का लक्ष्य रखा गया है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जिसे भारत और रूस ने संयुक्त रूप से विकसित किया है।
- फिलीपींस ने ब्रह्मोस के शोर-आधारित एंटी-शिप सिस्टम को तटीय रक्षा के लिए शामिल किया है।
- ब्रह्मोस के भूमि, समुद्र, वायु और पनडुब्बी-प्रक्षेपित संस्करण मौजूद हैं।
- दक्षिण चीन सागर एशिया का एक महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्र है, जो कई रणनीतिक समुद्री मार्गों से जुड़ा है।
कुल मिलाकर, ब्रह्मोस बेल्ट की अवधारणा यह दिखाती है कि आधुनिक रक्षा व्यवस्था में मिसाइल तैनाती केवल सैन्य क्षमता नहीं, बल्कि क्षेत्रीय रणनीति और समुद्री संतुलन का भी हिस्सा बन चुकी है।