पेरिस के पास BAPS मंदिर से भारत-फ्रांस सांस्कृतिक रिश्तों को नई पहचान
फ्रांस के बुस्सी-सेंट-जॉर्जेस में BAPS स्वामीनारायण हिंदू मंदिर का उद्घाटन भारत और फ्रांस के बीच सांस्कृतिक जुड़ाव का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया है। 6 सितंबर 2026 को औपचारिक रूप से प्रतिष्ठित यह मंदिर फ्रांस का पहला पारंपरिक पत्थर से बना हिंदू मंदिर है और मुख्यभूमि यूरोप में अपनी तरह का सबसे बड़ा मंदिर भी माना जा रहा है।
पारंपरिक शिल्प और आधुनिक निर्माण का संगम
यह मंदिर बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था, यानी BAPS, से जुड़ा है। BAPS स्वामीनारायण परंपरा का एक प्रमुख हिंदू सामाजिक-आध्यात्मिक संगठन है। मंदिर का निर्माण अप्रैल 2024 में शुरू हुआ था और इसमें भारत से लाए गए हाथ से तराशे गए पत्थरों का उपयोग किया गया। इन पत्थरों को फ्रांसीसी इंजीनियरिंग विशेषज्ञता के साथ जोड़ा गया, जिससे पारंपरिक स्थापत्य और आधुनिक निर्माण तकनीक का संतुलन सामने आया। इस परियोजना में फ्रांस की वास्तुकला फर्म Arte Charpentier भी शामिल रही।
उद्घाटन में आध्यात्मिक और राजनयिक दोनों आयाम
मंदिर का औपचारिक अभिषेक महंत स्वामी महाराज ने किया। उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से भाग लिया। यह तथ्य इस बात को रेखांकित करता है कि यह आयोजन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि भारत-फ्रांस संबंधों और प्रवासी भारतीय समुदाय की सांस्कृतिक उपस्थिति से भी जुड़ा हुआ है।
सांस्कृतिक उत्सव और प्रतीकात्मक महत्व
मंदिर उद्घाटन से पहले 3 सितंबर 2026 को पेरिस में सीन नदी पर जल यात्रा निकाली गई, जिसमें 5,500 से अधिक लोग और 11 सजी हुई नावें शामिल थीं। यह आयोजन 2 से 14 सितंबर 2026 तक चल रहे 13 दिवसीय संस्कृति महोत्सव का हिस्सा था। मंदिर का उद्घाटन ऐसे समय हुआ जब 2026 को भारत-फ्रांस नवाचार वर्ष के रूप में भी मनाया जा रहा है। BAPS ने इस मंदिर को 1970 में योगीजी महाराज से जुड़ी एक आध्यात्मिक दृष्टि से भी जोड़ा है, जिसे फ्रांस में ऑरली एयरपोर्ट पर ठहराव के दौरान आशीर्वाद मिला था।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- बुस्सी-सेंट-जॉर्जेस, फ्रांस के सीन-ए-मार्ने विभाग में स्थित है।
- महंत स्वामी महाराज BAPS के आध्यात्मिक गुरु हैं।
- सीन नदी पेरिस से होकर बहती है और फ्रांस की प्रमुख नदियों में शामिल है।
- Arte Charpentier एक फ्रांसीसी वास्तुकला फर्म है, जो इस मंदिर परियोजना से जुड़ी रही।
इस मंदिर का उद्घाटन यूरोप में भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत की बढ़ती उपस्थिति को दर्शाता है। साथ ही यह भारत और फ्रांस के बीच सांस्कृतिक संवाद, स्थापत्य परंपरा और सामुदायिक सहभागिता का भी एक सशक्त उदाहरण है।