पश्चिम बंगाल के नाम पर नई पहल, बदलाव का अधिकार संसद के पास

पश्चिम बंगाल के नाम पर नई पहल, बदलाव का अधिकार संसद के पास

पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर ‘पश्चिम बंग’ (Paschim Banga) करने का प्रस्ताव फिर चर्चा में है। भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई के अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने 5 अक्टूबर 2026 को कहा कि राज्य सरकार आगामी विधानसभा सत्र में इस संबंध में विधेयक लाने का इरादा रखती है। उन्होंने 7 अक्टूबर को प्रस्तावित नाम को आजादी के बाद राज्य के गठन से जुड़ा बताया। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने भी निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अधीन प्रस्ताव का समर्थन किया है।

नाम बदलने के प्रस्ताव में क्या है खास

प्रस्ताव का उद्देश्य राज्य के आधिकारिक नाम को ‘पश्चिम बंग’ करना है। राज्य सरकार ने इसे नाम को लेकर लंबे समय से चल रही बहस को समाप्त करने की पहल बताया है। हालांकि, राज्य विधानसभा में प्रस्ताव या विधेयक लाना अपने आप में नाम बदलने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। अंतिम बदलाव के लिए संसद की विधायी प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

संविधान में नाम परिवर्तन की प्रक्रिया

संविधान का अनुच्छेद 3 संसद को नए राज्य बनाने और मौजूदा राज्यों के क्षेत्र, सीमाएं या नाम बदलने का अधिकार देता है। इस विषय का विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना संसद में पेश नहीं किया जा सकता। प्रस्ताव से प्रभावित राज्य के विधानमंडल को अपनी राय देने के लिए भेजा जाता है और उसके लिए एक समय-सीमा तय की जाती है।

राज्य विधानसभा की राय संसद पर बाध्यकारी नहीं होती। अनुच्छेद 2 और 3 के तहत बने कानून में संविधान की पहली और चौथी अनुसूची से जुड़े आवश्यक बदलाव भी किए जा सकते हैं। ऐसे बदलावों को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन नहीं माना जाता। इसलिए राज्य का प्रस्ताव आगे बढ़ने पर भी नाम का आधिकारिक परिवर्तन संसद द्वारा कानून पारित किए जाने के बाद ही होगा।

पश्चिम बंगाल के नाम को लेकर पहले भी हुई पहल

राज्य के नाम पर पहले भी कई प्रस्ताव सामने आ चुके हैं। 1999 में वाम मोर्चा सरकार ने ‘वेस्ट बंग’ और ‘पश्चिम बंग’ जैसे विकल्पों पर विचार किया था और अंततः ‘बांग्ला’ नाम चुना था। वर्ष 2016 में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस सरकार ने भाषा के अनुसार अलग-अलग नाम सुझाए थे—बांग्ला में ‘बांग्ला’, अंग्रेजी में ‘बंगाल’ और हिंदी में ‘बांगाल’। केंद्र सरकार ने उस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • अनुच्छेद 3 राज्यों के गठन और उनके क्षेत्र, सीमाओं या नाम में बदलाव से संबंधित है।
  • राज्य पुनर्गठन से जुड़े विधेयक के लिए राष्ट्रपति की सिफारिश आवश्यक होती है।
  • प्रभावित राज्य के विधानमंडल से राय मांगी जाती है, लेकिन संसद उस राय से बाध्य नहीं होती।
  • अनुच्छेद 2 और 3 के कानूनों के तहत पहली और चौथी अनुसूची में जरूरी बदलाव किए जा सकते हैं।

राज्यों के नाम बदलने के उदाहरण

भारत में राज्यों के नाम बदलने के लिए पहले भी संसद ने कानून पारित किए हैं। मद्रास राज्य का नाम 1969 में तमिलनाडु, उत्तरांचल का नाम 2007 में उत्तराखंड और ओरिसा का नाम 2011 में ओडिशा किया गया। ये उदाहरण दिखाते हैं कि राज्य स्तर पर शुरू हुई पहल को आधिकारिक रूप देने के लिए संसदीय कानून जरूरी है।

इस बीच, वाराणसी में प्रस्तावित ‘पश्चिम बंग भवन’ को बंगाल से आने वाले पर्यटकों और तीर्थयात्रियों के लिए आवास तथा सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना है। फिलहाल नाम परिवर्तन का प्रस्ताव प्रारंभिक राजनीतिक पहल है; इसकी संवैधानिक परिणति संसद की प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।

Originally written on October 7, 2026 and last modified on October 7, 2026.

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