पंचकूला में गिद्ध संरक्षण पर राष्ट्रीय मंथन, संकट से पुनरुद्धार की दिशा

पंचकूला में गिद्ध संरक्षण पर राष्ट्रीय मंथन, संकट से पुनरुद्धार की दिशा

हरियाणा के पंचकूला में 6 सितंबर 2026 को ‘संकट से पुनरुद्धार – भारत के गिद्धों का संरक्षण’ विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की गई। अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस के अवसर पर हुई इस बैठक का उद्देश्य देश में गिद्ध संरक्षण, प्रजनन और वन्यजीव प्रबंधन से जुड़ी संस्थाओं को एक मंच पर लाना था। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने कार्यशाला का उद्घाटन किया।

गिद्धों की गिरती आबादी और उसके कारण

भारत में गिद्धों की संख्या 1990 के दशक के बाद तेजी से घटी। इसका प्रमुख कारण पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली डाइक्लोफेनाक जैसी कुछ गैर-स्टेरॉयडल सूजनरोधी दवाएं रहीं, जो मृत पशुओं के शरीर में पहुंचकर गिद्धों के लिए घातक साबित हुईं। गिद्ध पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण obligate scavengers हैं, यानी ये मुख्य रूप से मृत जानवरों के अवशेषों पर निर्भर रहते हैं और प्राकृतिक रूप से शव निस्तारण में मदद करते हैं।

भारत में पाए जाने वाले प्रमुख गिद्धों में सफेद-पीठ वाला गिद्ध, भारतीय गिद्ध, पतली चोंच वाला गिद्ध, लाल सिर वाला गिद्ध और मिस्र का गिद्ध शामिल हैं। इनमें से कई प्रजातियां IUCN रेड लिस्ट में अत्यंत संकटग्रस्त या संकटग्रस्त श्रेणी में दर्ज हैं।

संरक्षण रणनीति में सुरक्षित क्षेत्र और प्रजनन केंद्र

गिद्ध संरक्षण के लिए देश में Vulture Safe Zones की अवधारणा अपनाई गई है। इन क्षेत्रों में डाइक्लोफेनाक और अन्य हानिकारक पशु-चिकित्सकीय दवाओं के उपयोग पर रोक या कड़ी निगरानी रखी जाती है, ताकि गिद्धों को दूषित शवों से बचाया जा सके। साथ ही, शव उपलब्धता और निगरानी व्यवस्था को भी बेहतर बनाया जाता है।

भारत में संरक्षण प्रजनन केंद्र भी गिद्धों की पुनर्बहाली में अहम भूमिका निभा रहे हैं। इन केंद्रों में प्रजातियों की कैप्टिव आबादी को सुरक्षित रखा जाता है, आनुवंशिक प्रबंधन किया जाता है और भविष्य में पुनः जंगल में छोड़ने की योजना तैयार की जाती है। हरियाणा के पिंजौर स्थित जटायु कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर देश के प्रमुख गिद्ध प्रजनन केंद्रों में से एक है।

कार्यशाला में संस्थागत भागीदारी और व्यापक महत्व

यह कार्यशाला पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण, हरियाणा वन एवं वन्यजीव विभाग, बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी और जटायु कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर के सहयोग से आयोजित की गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि गिद्ध संरक्षण केवल वन्यजीव मुद्दा नहीं, बल्कि वन्यजीव स्वास्थ्य, पशु-चिकित्सा दवा नियमन और शव प्रबंधन से भी जुड़ा हुआ विषय है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस हर साल सितंबर के पहले शनिवार को मनाया जाता है।
  • डाइक्लोफेनाक को दक्षिण एशिया में गिद्धों की मृत्यु का एक प्रमुख कारण माना गया।
  • गिद्ध पारिस्थितिकी में obligate scavenger कहलाते हैं, यानी ये मुख्यतः मृत जीवों पर निर्भर रहते हैं।
  • बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी भारत की सबसे पुरानी प्राकृतिक इतिहास संस्थाओं में से एक है।

पंचकूला की यह कार्यशाला गिद्ध संरक्षण को वैज्ञानिक, संस्थागत और नीतिगत स्तर पर आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। भारत में इन पक्षियों की वापसी जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन दोनों के लिए अहम है।

Originally written on September 7, 2026 and last modified on September 7, 2026.

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