दुनिया का चौथा सबसे बड़ा गैस हब बना भारत: क्या है एनर्जी सेक्टर का यह मेगा गेमचेंजर?
दुनिया के एनर्जी मैप पर भारत ने एक ऐसी छलांग लगाई है जिसने वैश्विक बाजार के बड़े-बड़े दिग्गजों को हैरान कर दिया है। इंटरनेशनल गैस यूनियन (IGU) की ‘वर्ल्ड एलएनजी रिपोर्ट’ के मुताबिक, भारत अब स्पेन को पछाड़कर दुनिया का चौथा सबसे बड़ा एलएनजी रीगैसिफिकेशन (LNG Regasification) मार्केट बन चुका है। इस खबर का सीधा और आसान मतलब यह है कि विदेशों से पानी के जहाजों में भरकर जो लिक्विड नेचुरल गैस (LNG) भारत आती है, उसे वापस इस्तेमाल करने लायक गैस में बदलने की हमारी क्षमता अब दुनिया में चौथे नंबर पर आ गई है। यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है। यह भारत की उस महा-योजना का हिस्सा है, जिसके तहत देश अपनी अर्थव्यवस्था को कोयले और तेल के भरोसे से निकालकर क्लीन एनर्जी यानी साफ ईंधन की तरफ ले जाना चाहता है। आखिर क्या है यह रीगैसिफिकेशन का पूरा खेल? भारत ने अचानक इतनी बड़ी क्षमता कैसे हासिल की? और इस बदलाव से देश के आम नागरिकों की जिंदगी और फैक्ट्रियों पर क्या असर पड़ने वाला है? आइए इस पूरे बिजनेस और इंफ्रास्ट्रक्चर गेमचेंजर को गहराई से समझते हैं।
रीगैसिफिकेशन का विज्ञान: माइनस 162 डिग्री का यह सफर क्या है?
नेचुरल गैस को उसके असली रूप में एक देश से दूसरे देश तक हजारों किलोमीटर दूर पाइपलाइन के जरिए भेजना बेहद खर्चीला और कई बार नामुमकिन होता है। इसलिए एक खास तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है जिसे एलएनजी (LNG – Liquefied Natural Gas) कहते हैं। जब प्राकृतिक गैस को माइनस 162 डिग्री सेल्सियस तापमान पर ठंडा किया जाता है, तो यह गैस से लिक्विड (तरल) बन जाती है। लिक्विड बनने के बाद इसका वॉल्यूम (आयतन) 600 गुना कम हो जाता है। यानी बहुत सारी गैस एक छोटे से टैंकर में समा सकती है। अमेरिका, कतर या ऑस्ट्रेलिया जैसे देश इसी लिक्विड गैस को बड़े-बड़े पानी के जहाजों (क्रायोजेनिक टैंकरों) में भरकर भारत भेजते हैं। अब असली काम शुरू होता है भारत के तटों पर बने टर्मिनल्स पर। जब यह लिक्विड गैस भारत पहुंचती है, तो इसे सीधे चूल्हे या फैक्ट्री में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसे वापस गैस के रूप में बदलना पड़ता है। इसी लिक्विड को गर्म करके दोबारा गैस में बदलने की पूरी प्रक्रिया को ‘रीगैसिफिकेशन’ कहा जाता है। भारत ने इसी क्षमता को रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ाकर दुनिया में चौथा स्थान हासिल किया है।

कैसे बदला भारत का भाग्य? इन दो बड़े प्रोजेक्ट्स ने पलटी बाजी
भारत ने अपने आठ प्रमुख रीगैसिफिकेशन टर्मिनल्स के जरिए कुल 52.5 मिलियन टन प्रति वर्ष (mtpa) की क्षमता जोड़कर स्पेन जैसे यूरोपीय देश को पीछे छोड़ दिया है। हाल के समय में भारत की इस कामयाबी के पीछे दो बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की सबसे बड़ी भूमिका रही है:

छारा एलएनजी टर्मिनल (गुजरात)
यह पूरी तरह से एक नया ऑनशोर (तटीय) टर्मिनल है, जिसकी क्षमता 5 मिलियन टन प्रति वर्ष है। गुजरात के तट पर बने इस टर्मिनल के चालू होने से पश्चिमी भारत में उद्योगों को गैस की सप्लाई कई गुना आसान हो गई है।
दाभोल एलएनजी टर्मिनल (महाराष्ट्र)
यह टर्मिनल पहले से मौजूद था, लेकिन इसकी एक बड़ी कमजोरी थी। मानसून के महीनों में समंदर की ऊंची लहरों के कारण यहां जहाजों का आना रुक जाता था और यह टर्मिनल बंद पड़ा रहता था। भारत ने यहां एक विशाल ‘ब्रेकवाटर’ (लहरों को रोकने वाली दीवार) का निर्माण पूरा किया। नतीजा यह हुआ कि अब यह टर्मिनल साल के 365 दिन बिना रुके काम कर सकता है, और इसकी क्षमता भी 2.9 mtpa से बढ़कर सीधे 5 mtpa हो गई है। गुजरात का दहेज एलएनजी टर्मिनल (Dahej LNG Terminal) आज भी भारत का सबसे बड़ा और इकलौता ‘अल्ट्रा-लार्ज’ टर्मिनल है, जिसकी क्षमता 17.5 mtpa है। वैश्विक स्तर पर यह दुनिया का छठा सबसे बड़ा टर्मिनल माना जाता है।
तीन बड़े सेक्टर, जिन्होंने बढ़ा दी गैस की भूख
भारत सरकार का लक्ष्य है कि साल 2030 तक देश के कुल एनर्जी मिक्स (ऊर्जा खपत) में प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी को मौजूदा 6-7% से बढ़ाकर 15% किया जाए। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए तीन बड़े सेक्टर्स में गैस की मांग तेजी से बढ़ रही है:
फर्टिलाइजर (खाद) इंडस्ट्री
भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां यूरिया व अन्य खादों की मांग हमेशा रहती है। अब देश की बड़ी फर्टिलाइजर कंपनियां कोयले या महंगे तेल को छोड़कर क्लीन नेचुरल गैस का इस्तेमाल कर रही हैं।
सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (CGD)
आपके घर में आने वाली पीएनजी (पाइप वाली रसोई गैस) और आपकी कारों में भरी जाने वाली सीएनजी (CNG) की खपत हर शहर में रिकॉर्ड तोड़ रही है। देश के सैकड़ों जिलों में बिछ रहा पाइपलाइन नेटवर्क इस गैस का सबसे बड़ा खरीदार है।
इंडस्ट्रियल और यूटिलिटी सेक्टर
कांच, स्टील, सिरेमिक और रिफाइनरी जैसे उद्योगों को भारी मात्रा में हीटिंग की जरूरत होती है। प्रदूषण के सख्त नियमों के कारण ये उद्योग अब तेजी से प्राकृतिक गैस की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) का अनुमान है कि सिटी गैस, औद्योगिक मांग और बिजली उत्पादन के दम पर साल 2030 तक भारत में प्राकृतिक गैस की कुल खपत में 60% की भारी बढ़ोतरी होने वाली है।
इंफ्रास्ट्रक्चर तो बन गया, लेकिन क्या है असली चुनौती?
भले ही भारत ने दुनिया में चौथा स्थान हासिल कर लिया हो, लेकिन इस चमकती तस्वीर के पीछे एक बड़ी चुनौती भी छिपी हुई है, जिसे अर्थशास्त्री ‘कैपेसिटी यूटिलाइजेशन’ (क्षमता का वास्तविक उपयोग) की समस्या कहते हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भारत के इन टर्मिनल्स की क्षमता का उपयोग साल 2024 के 58% से घटकर 2025 में करीब 47% पर आ गया है。 इसका मतलब यह है कि हमारे पास गैस को रीगैसिफाई करने की मशीनें और इंफ्रास्ट्रक्चर तो दोगुना तैयार है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में एलएनजी की कीमतें ज्यादा होने या गर्मियों में मांग में उतार-चढ़ाव के कारण हम अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। दहेज टर्मिनल को छोड़ दें, तो देश के कई अन्य टर्मिनल्स पर उपयोग का यह स्तर काफी कम है। हालांकि, यह एक सामान्य प्रक्रिया है। जब भी किसी देश में इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से विस्तार होता है, तो मांग को उस स्तर तक पहुंचने में थोड़ा समय लगता है।
2028 तक का नया चक्रव्यूह: भारत नहीं रुकने वाला
भारत अपनी इस रफ्तार को थमने नहीं देना चाहता। मौजूदा क्षमता के अलावा, देश में इस समय चार बड़े एलएनजी प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है। इसमें एक बिल्कुल नया टर्मिनल और तीन पुराने टर्मिनल्स (जिसमें दहेज भी शामिल है) के विस्तार का काम शामिल है। जब साल 2028 तक ये सभी प्रोजेक्ट्स बनकर तैयार हो जाएंगे, तो भारत के गैस नेटवर्क में 11.3 mtpa की अतिरिक्त क्षमता और जुड़ जाएगी। इसके साथ ही सरकार देश के भीतर लगभग 33,500 किलोमीटर लंबी नेशनल गैस ग्रिड (पाइपलाइन नेटवर्क) भी बिछा रही है, ताकि तटीय टर्मिनल्स पर तैयार होने वाली इस गैस को देश के दूर-दराज के गांवों और फैक्ट्रियों तक आसानी से पहुंचाया जा सके।
समंदर से शहरों तक: रूस, कतर और अमेरिका के साथ भारत का पावर गेम
ग्लोबल एनर्जी मार्केट में भारत का यह नया मुकाम उसे कूटनीतिक रूप से भी बेहद मजबूत बनाता है। अब भारत सिर्फ एक खरीदार नहीं रह गया है, बल्कि एक ऐसा महा-बाजार बन चुका है जिसे कोई भी गैस उत्पादक देश नजरअंदाज नहीं कर सकता। भारत ने कतर, रूस और अमेरिका की दिग्गज कंपनियों के साथ अगले 20 सालों के लिए लॉन्ग-टर्म गैस सप्लाई के सौदे किए हैं। यह नया इंफ्रास्ट्रक्चर भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव से लड़ने की ताकत देता है। जब दुनिया में गैस सस्ती होगी, भारत भारी मात्रा में लिक्विड गैस खरीदकर अपने इन टर्मिनल्स के जरिए देश की अर्थव्यवस्था को रफ्तार दे सकेगा। प्रदूषण कम करने, उद्योगों को सस्ती ऊर्जा देने और देश के करोड़ों घरों तक साफ रसोई ईंधन पहुंचाने की दिशा में यह रीगैसिफिकेशन मार्केट भारत के आत्मनिर्भर बनने के सफर का एक बेहद मजबूत स्तंभ साबित होने वाला है।