थाईलैंड में 2,000 वर्ष पुराने भारतीय स्वर्ण छल्लों की खोज, ब्राह्मी लिपि ने खोले प्राचीन संबंधों के नए प्रमाण
थाईलैंड के पश्चिमी हिस्से में स्थित फेत्चाबुरी प्रांत के डॉन याई थोंग पुरातात्विक स्थल से लगभग 2,000 वर्ष पुराने दो भारतीय स्वर्ण छल्लों की महत्वपूर्ण खोज हुई है। इस खोज ने प्राचीन भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच सांस्कृतिक तथा समुद्री संपर्कों के इतिहास को नई मजबूती प्रदान की है। इनमें से एक छल्ले पर प्राचीन ब्राह्मी लिपि में अभिलेख अंकित है, जबकि दूसरा छल्ला सादा है। दोनों छल्ले मानव कंकालों के साथ प्राप्त हुए हैं, जिससे इनके ऐतिहासिक महत्व में और वृद्धि हुई है।
डॉन याई थोंग पुरातात्विक स्थल का महत्व
डॉन याई थोंग पुरातात्विक स्थल बैंकॉक से लगभग 130 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। वर्ष 2026 में स्थानीय लोगों द्वारा धान के खेत में प्राचीन कांस्य नगाड़ों के अवशेष मिलने के बाद इस स्थल की पहचान की गई। इसके बाद शुरू हुई खुदाई में कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य सामने आए हैं। वर्तमान में भी यहां उत्खनन कार्य जारी है और विशेषज्ञों को उम्मीद है कि आगे और महत्वपूर्ण अवशेष प्राप्त हो सकते हैं।
ब्राह्मी अभिलेख और उसका ऐतिहासिक महत्व
एक स्वर्ण छल्ले पर ब्राह्मी लिपि में “पुसरखितस” (Pusarakhitasa) जैसा अभिलेख अंकित है, जिसका अर्थ “पुष्य द्वारा संरक्षित व्यक्ति” माना गया है। ब्राह्मी भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन लिपियों में से एक है और इसका व्यापक उपयोग मौर्य तथा उत्तर-मौर्य काल में हुआ था। इस अभिलेख से यह संकेत मिलता है कि उस समय भारतीय सांस्कृतिक प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुंच चुका था। भारतीय ज्योतिष में पुष्य 27 नक्षत्रों में से एक अत्यंत शुभ नक्षत्र माना जाता है। इस कारण यह अभिलेख केवल एक नाम नहीं बल्कि उस समय की धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं का भी परिचायक है।
भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के प्राचीन संबंध
पुरातत्वविदों के अनुसार ये छल्ले लौह युग के दफन स्थलों से प्राप्त हुए हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच समुद्री व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और लोगों की आवाजाही सक्रिय थी। इससे पहले भी थाईलैंड के क्राबी और चुम्फोन क्षेत्रों में ब्राह्मी लिपि वाले अवशेष मिल चुके हैं, जो दोनों क्षेत्रों के प्राचीन संबंधों की पुष्टि करते हैं। इन खोजों से यह भी पता चलता है कि भारतीय लिपि, धार्मिक परंपराएं और व्यापारिक नेटवर्क समुद्री मार्गों के माध्यम से दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुंचे थे।
संरक्षण और आगे का अध्ययन
खोजे गए दोनों स्वर्ण छल्लों को सुरक्षित संरक्षण और विस्तृत अध्ययन के लिए रत्चाबुरी प्रांत स्थित फ्रा नाखोन खीरी संग्रहालय भेज दिया गया है। पुरातत्वविद तेजी से उत्खनन कार्य कर रहे हैं क्योंकि भूजल और भारी वर्षा के कारण पुरावशेषों तथा मानव अवशेषों को नुकसान पहुंचने की आशंका बनी रहती है। भविष्य के अध्ययन से इस स्थल के बारे में और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जानकारियां मिलने की संभावना है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- ब्राह्मी लिपि भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन लिपियों में से एक मानी जाती है और अनेक प्रारंभिक अभिलेख इसी में लिखे गए हैं।
- पुष्य भारतीय ज्योतिष के 27 नक्षत्रों में शामिल एक अत्यंत शुभ नक्षत्र है।
- दक्षिण-पूर्व एशिया के लौह युग में दफन स्थलों, कांस्य वस्तुओं और आयातित कलाकृतियों का विशेष महत्व माना जाता है।
- थाईलैंड में पहले भी ब्राह्मी लिपि वाले पुरावशेष क्राबी और चुम्फोन क्षेत्रों से प्राप्त हो चुके हैं, जो भारत के प्राचीन समुद्री संपर्कों के प्रमाण माने जाते हैं।
थाईलैंड में मिले इन प्राचीन भारतीय स्वर्ण छल्लों की खोज केवल एक पुरातात्विक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच हजारों वर्ष पुराने सांस्कृतिक, धार्मिक और व्यापारिक संबंधों का सशक्त प्रमाण भी है। आने वाले समय में इस स्थल पर होने वाले विस्तृत अनुसंधान से प्राचीन इतिहास के कई नए पहलुओं पर महत्वपूर्ण जानकारी मिलने की उम्मीद है।