त्रिपुरा में अवैध पुनर्वास केंद्रों पर सख्ती, मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी तेज
त्रिपुरा में 19 अवैध डि-एडिक्शन और मानसिक स्वास्थ्य पुनर्वास केंद्रों की पहचान के बाद राज्य प्रशासन और मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण ने सख्त रुख अपनाया है। 13 सितंबर 2026 को त्रिपुरा राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण ने इन निजी केंद्रों को कारण बताओ नोटिस जारी किए। यह कार्रवाई मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के तहत की गई है, जो ऐसे संस्थानों के पंजीकरण, मानकों और मरीजों की सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्था तय करता है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह कार्रवाई
डि-एडिक्शन और मानसिक स्वास्थ्य पुनर्वास केंद्र उन लोगों के लिए बनाए जाते हैं जिन्हें नशा-उपचार, परामर्श और आवासीय देखभाल की जरूरत होती है। ऐसे केंद्रों में प्रशिक्षित स्टाफ, सुरक्षित वातावरण, बुनियादी सुविधाएं और तय मानकों का पालन अनिवार्य माना जाता है। जब कोई केंद्र बिना पंजीकरण या आवश्यक ढांचे के चलता है, तो मरीजों की सुरक्षा और उपचार की गुणवत्ता दोनों पर सवाल उठते हैं।
त्रिपुरा में सामने आए मामलों में पंजीकरण प्रक्रिया पूरी न होना, ढांचे की कमी, प्रशिक्षित कर्मचारियों का अभाव, सुरक्षा व्यवस्था का न होना और सुविधाओं की कमी जैसी खामियां सामने आईं। प्राधिकरण ने इन केंद्रों से सात दिन के भीतर जवाब मांगा है और पूछा है कि संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए।
कानूनी ढांचा और राज्य की भूमिका
मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 भारत में मानसिक बीमारी से जुड़े अधिकारों और मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों के नियमन की मुख्य केंद्रीय कानून व्यवस्था है। इस कानून के तहत राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण अपने-अपने राज्यों में ऐसे संस्थानों की निगरानी करते हैं। वे पंजीकरण, निरीक्षण, स्टाफिंग, सुरक्षा, सुविधाओं और मरीजों की देखभाल से जुड़े मानकों की जांच करते हैं।
यदि कोई संस्थान बिना अनुमति संचालित होता है या तय मानकों का पालन नहीं करता, तो उसके खिलाफ नोटिस, निरीक्षण, पंजीकरण रद्द करने या अन्य वैधानिक कार्रवाई की जा सकती है। कारण बताओ नोटिस इसी प्रक्रिया का पहला औपचारिक कदम होता है, जिसमें संस्थान को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाता है।
स्वप्ना फाउंडेशन मामला और आगे की कार्रवाई
कार्रवाई के दायरे में आए केंद्रों में अगरतला स्थित स्वप्ना फाउंडेशन का नाम भी शामिल है। इसी केंद्र से जुड़े एक हालिया अपराध और कथित मरीज की मौत के मामले ने जांच को और गंभीर बना दिया है। 13 सितंबर 2026 तक इस कथित मौत के मामले में फाउंडेशन के संस्थापक सहित 12 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका था।
यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित नहीं है, बल्कि निजी पुनर्वास केंद्रों की निगरानी, जवाबदेही और कानूनी अनुपालन पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है। राज्य स्तर पर ऐसी कार्रवाई यह संकेत देती है कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर चल रहे अवैध संस्थानों पर अब सख्त निगरानी बढ़ाई जा रही है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 भारत में मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों के नियमन की प्रमुख केंद्रीय कानून व्यवस्था है।
- राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण अपने-अपने राज्यों में मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों के पंजीकरण और अनुपालन की निगरानी करते हैं।
- कारण बताओ नोटिस एक औपचारिक कानूनी प्रक्रिया है, जिसमें कार्रवाई से पहले जवाब मांगा जाता है।
- बिना पंजीकरण, बिना प्रशिक्षित स्टाफ और बिना सुरक्षा मानकों के चलने वाले पुनर्वास केंद्रों पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
त्रिपुरा की यह कार्रवाई दिखाती है कि मानसिक स्वास्थ्य और नशामुक्ति सेवाओं के क्षेत्र में केवल सुविधा होना पर्याप्त नहीं, बल्कि वैध पंजीकरण, सुरक्षा और मानकों का पालन भी उतना ही जरूरी है।