तेल के बाद अब दुनिया का नया ईंधन: जानिए भारत कैसे रच रहा है चिप निर्माण की महागाथा?

तेल के बाद अब दुनिया का नया ईंधन: जानिए भारत कैसे रच रहा है चिप निर्माण की महागाथा?

क्या आपने कभी सोचा है कि आपके हाथ में मौजूद स्मार्टफोन, आपके घर का स्मार्ट टीवी, सड़कों पर दौड़ती इलेक्ट्रिक कारें और यहां तक कि देश की सुरक्षा करने वाले मिसाइल सिस्टम के अंदर ऐसा क्या है जो इन्हें ‘स्मार्ट’ बनाता है? वह चीज़ है—एक छोटी सी सिलिकॉन चिप, जिसे हम सेमीकंडक्टर कहते हैं। 21वीं सदी में सेमीकंडक्टर को दुनिया का ‘नया सोना’ या ‘नया कच्चा तेल’ कहा जा रहा है। जिस देश का इस पर नियंत्रण होगा, वही दुनिया की अर्थव्यवस्था और तकनीक पर राज करेगा। अब तक इस खेल में ताइवान, दक्षिण कोरिया, अमेरिका और चीन का दबदबा रहा है। लेकिन अब भारत इस वैश्विक समीकरण को बदलने के लिए एक बहुत बड़ा दांव खेल चुका है। भारत सरकार ने ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ (ISM) के तहत एक बेहद खास रणनीति अपनाई है, जिसे ‘ओएसएटी’ (OSAT) रणनीति कहा जा रहा है। इस मास्टरस्ट्रोक के जरिए भारत सीधे उस गढ़ में एंट्री कर रहा है, जहां अरबों डॉलर का बिजनेस छिपा है।

आखिर क्या है यह ओएसएटी (OSAT) तकनीक?

सेमीकंडक्टर के पूरे बिजनेस को समझने के लिए इसे दो मुख्य हिस्सों में बांटा जाता है। पहला हिस्सा होता है ‘फैब्रिकेशन’ (Fab), जहां सिलिकॉन की पतली परतों पर अरबों छोटे ट्रांजिस्टर लगाकर कच्ची चिप तैयार की जाती है। यह काम बेहद जटिल और खर्चीला होता है। इसके बाद आता है दूसरा सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा—OSAT, यानी आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट (Outsourced Semiconductor Assembly and Test)। जब फैब्रिकेशन लैब से कच्ची चिप (Wafer) बनकर बाहर आती है, तो वह सीधे किसी फोन या कार में नहीं लगाई जा सकती। वह बहुत नाजुक होती है और उस पर धूल का एक कण भी उसे बर्बाद कर सकता है। यहीं पर काम शुरू होता है ओएसएटी कंपनियों का।

आखिर क्या है यह ओएसएटी (OSAT) तकनीक?
असेंबली और पैकेजिंग

कच्ची चिप को काटकर एक मजबूत सुरक्षात्मक आवरण या प्लास्टिक-कंटेनर में बंद किया जाता है। इसके साथ ही इसमें बारीक तार या तांबे के कनेक्शन जोड़े जाते हैं ताकि इसे किसी भी इलेक्ट्रॉनिक सर्किट बोर्ड (PCB) पर आसानी से फिट किया जा सके।

असेंबली और पैकेजिंग
टेस्टिंग और क्वालिटी चेक

पैकेजिंग के बाद इन चिप्स की कड़े मानकों पर टेस्टिंग होती है। यह देखा जाता है कि क्या यह चिप भारी गर्मी, दबाव या बिजली के उतार-चढ़ाव को झेल सकती है या नहीं। जो चिप इस परीक्षा में पास होती है, वही बाजार में बिकने के लिए जाती है।

भारत ने सीधे ‘फैब’ के बजाय ‘ओएसएटी’ को क्यों चुना?

दुनिया की बड़ी-बड़ी टेक कंपनियां शुरुआत में भारत में बड़ी फैब्रिकेशन फैक्ट्रियां (Fabs) लगाने से कतरा रही थीं। इसकी वजह थी कि एक अत्याधुनिक फैब लगाने में 10 अरब से 25 अरब डॉलर (लगभग 80 हजार से 2 लाख करोड़ रुपये) का खर्च आता है और इसे चालू होने में 5 से 7 साल लग जाते हैं। इसके लिए लगातार पानी और बिना किसी रुकावट के बिजली की जरूरत होती है। भारत सरकार ने बड़ी चतुराई से अपनी रणनीति बदली। भारत ने सोचा कि सीधे एवरेस्ट पर चढ़ने के बजाय, पहले उसकी तलहटी में मजबूत पकड़ बनाई जाए। ओएसएटी प्लांट्स लगाने का खर्च फैब के मुकाबले बहुत कम होता है। एक बेहतरीन ओएसएटी प्लांट 300 मिलियन से 2 बिलियन डॉलर के बीच बनकर तैयार हो जाता है और यह महज दो साल के भीतर काम करना शुरू कर देता है। इस रणनीति का सबसे बड़ा फायदा यह है कि भारत के पास पहले से ही दुनिया का 20 प्रतिशत से ज्यादा सेमीकंडक्टर डिजाइन टैलेंट मौजूद है। हमारे इंजीनियर चिप का डिजाइन तो बना लेते थे, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग के लिए हमें विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था। अब ओएसएटी क्षमता आ जाने से भारत डिजाइन से लेकर टेस्टिंग तक का पूरा पैकेज दुनिया को ऑफर कर पा रहा है।

जमीन पर दिखने लगा असर: गुजरात का साणंद बना भारत का ‘सिलिकॉन वैली’

यह रणनीति सिर्फ कागजों पर नहीं है, बल्कि जमीन पर इसके ऐतिहासिक नतीजे दिखने लगे हैं। गुजरात का साणंद शहर, जो कभी ऑटोमोबाइल हब के रूप में जाना जाता था, अब भारत का पहला ‘चिप पैकेजिंग क्लस्टर’ बन चुका है। इसकी तुलना ताइवान के शिनचू साइंस पार्क और दक्षिण कोरिया के ग्योंगी प्रांत से होने लगी है। साणंद में अमेरिकी कंपनी माइक्रोन टेक्नोलॉजी (Micron Technology) और कायन्स सेमीकॉन (Kaynes Semicon) के ओएसएटी प्लांट्स पहले ही ऑपरेशनल हो चुके हैं। इसी कड़ी में भारत ने एक और बड़ी कामयाबी हासिल की जब सीजी सेमी (CG Semi) के विशाल ओएसएटी प्लांट में कमर्शियल प्रोडक्शन की शुरुआत हो गई। सीजी सेमी दरअसल भारत की सीजी पावर, जापान की प्रसिद्ध कंपनी रेनेसास इलेक्ट्रॉनिक्स (Renesas Electronics) और थाईलैंड की स्टार्स माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स का एक संयुक्त उद्यम (Joint Venture) है। करीब 7,600 करोड़ रुपये के निवेश से बने इस प्लांट की शुरुआती क्षमता सालाना 20 करोड़ चिप पैक करने की है, जिसे आगे बढ़ाकर 500 करोड़ यूनिट सालाना करने की योजना है। यहां बनने वाली चिप्स का इस्तेमाल कारों, स्कूटर्स, 5जी उपकरणों और औद्योगिक मशीनों में होगा और इन्हें सीधे जापान, अमेरिका और यूरोप के बाजारों में एक्सपोर्ट किया जाएगा।

‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0’ और भविष्य का रोडमैप

भारत सरकार अपनी इस शुरुआती सफलता से संतुष्ट होकर बैठने वाली नहीं है। सरकार ने बजट में ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0’ (ISM 2.0) का एलान किया है, जिसके लिए शुरुआती तौर पर भारी वित्तीय आवंटन को मंजूरी दी गई है। पूरे मिशन के लिए 1.25 लाख करोड़ रुपये से अधिक का खाका तैयार किया गया है। मिशन 1.0 का ध्यान भारत में बुनियादी ढांचा खड़ा करने और ओएसएटी प्लांट्स को शुरू करने पर था। वहीं मिशन 2.0 का लक्ष्य बहुत बड़ा है। इसके तहत भारत अब सेमीकंडक्टर बनाने वाली मशीनों, उपकरणों और जरूरी रसायनों (Ultra-high purity gases and specialty chemicals) का निर्माण भी देश के भीतर ही करने जा रहा है। इसके साथ ही टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स (Tata Electronics) द्वारा धोलेरा में भारत का पहला कमर्शियल सेमीकंडक्टर फैब (Foundry) भी तेजी से बनाया जा रहा है। भारत का लक्ष्य साल 2035 तक दुनिया के शीर्ष सेमीकंडक्टर देशों की कतार में सबसे आगे खड़े होने का है।

भारत के इस कदम के वैश्विक और रणनीतिक मायने

कोविड-19 महामारी के दौरान जब दुनिया में चिप की भारी किल्लत हो गई थी, तब कार कंपनियों से लेकर स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियों तक का अरबों डॉलर का नुकसान हुआ था। उस वक्त दुनिया को समझ आया कि चिप सप्लाई के लिए सिर्फ एक या दो देशों पर निर्भर रहना कितना खतरनाक हो सकता है। दुनिया की बड़ी कंपनियां अब ‘चाइना प्लस वन’ (China Plus One) की नीति अपना रही हैं, यानी वे चीन के अलावा किसी और मजबूत देश में अपना मैन्युफैक्चरिंग बेस बनाना चाहती हैं। भारत का ओएसएटी पर फोकस करना इसी मौके को भुनाने की एक सोची-समझी चाल है। इससे न केवल भारत की विदेशी कूरियर और चिप आयात पर निर्भरता खत्म होगी, बल्कि देश के भीतर अगले पांच सालों में 50,000 से ज्यादा हाई-टेक नौकरियां पैदा होंगी।

चिप की दुनिया के कुछ अनोखे और हैरान करने वाले सच

जिस सिलिकॉन वेफर से यह चमत्कारी चिप बनती है, वह असल में साधारण रेत (Quartz Gravel) से तैयार की जाती है। रेत को पिघलाकर 99.9999999% शुद्ध सिलिकॉन में बदला जाता है। एक आधुनिक सेमीकंडक्टर चिप के भीतर मौजूद ट्रांजिस्टर का आकार मानव बाल की चौड़ाई से भी हजारों गुना छोटा होता है। भारत का लक्ष्य आने वाले समय में 3-नैनोमीटर और 2-नैनoमीटर जैसी अत्याधुनिक तकनीक पर काम करने का है। एक चिप को बनाने और पैक करने की प्रक्रिया के दौरान हवा की शुद्धता किसी अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर से भी 100 गुना अधिक रखनी पड़ती है। अगर हवा में तैरता एक छोटा सा डस्ट पार्टिकल भी वेफर पर गिर जाए, तो लाखों रुपये की चिप पल भर में कबाड़ हो जाती है। भारत अपनी ओएसएटी रणनीति के दम पर धीरे-धीरे ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स वैल्यू चेन के केंद्र में आता जा रहा है। वह दिन दूर नहीं जब दुनिया के बेहतरीन गैजेट्स के अंदर ‘मेड इन इंडिया’ की मुहर लगी सिलिकॉन चिप्स धड़क रही होंगी।

Originally written on July 9, 2026 and last modified on July 9, 2026.

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